कुरान की झगड़े करने वाली आयतें

कुरान की कुछ आयतें जो ईमानवालों (मुसलमानों) को अन्य धर्मालंबियों से झगडा करने का आदेश देती हैं |

 

१.      “फिर जब हराम के महीने बीत जाएँ तो ‘मुशरिकों’ को जहां-कही पाओ कत्ल करो, उन्हें पकड़ो, उन्हें घेरो, और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो | यदि वे ‘तौबा’ कर लें और ‘नमाज’ कायम करें ‘जकात’ दें तो उनका मार्ग छोड़ दो | निहसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है |” (10.9.5)

२.   “हे ‘इमानवालो’ ! ‘मुशरिक’ (मूर्तिपूजक) तो नापाक हैं |” (10.9.28)

३.  “निःसन्देह ‘काफिर’ तुम्हारे (इमनवालों के) खुले शत्रु है |” (5.4.101)

४.  “हे ईमान लाने वालो (मुसलमानों) उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आस-पास हैं,  और चाहिए कि वे तुम में सख्ती पायें | (11.9.123)

५. “जिन लोगों ने हमारी आयातों का इंकार किया उन्हें जल्द ही हम अग्नि में झोंक देंगे | जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वाद कर लें |” (5.5.56)

६. “हे ईमान लानेवालो ! अपने बापों और अपने भाइयों को अपना मित्र न बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा ‘कुफ़्र’ को पसंद करें | जो कोई तुममें से उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे |” (10.9.23)

७. “अल्लाह काफिर लोगों को मार्ग नहीं दिखाता | “  (10.9.37)

८. “हे ईमान लानेवालो ! काफिरों को अपना मित्र न बनाओ | अल्लाह से डरते रहो यदि तुम ईमान लाने वाले हो | (6.5.57)

९. फिटकारे हुए (गैर-मुसलमानों) जहाँ कहीं भी पाये जायेंगे, पकडे जाएँगे और बुरी तरह क़त्ल किये जाएँगे | (22.33.61)

१०. “ (कहा जाएगा) ; निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवाय पूजते थे, ‘जहन्नम’ का ईधन हो | तुम अवश्य उसके घाट उतरोगे |” (17.21.98)

११. “और इससे बढ़कर जालिम और कौन होगा जिसे उसके ‘रब’ की ‘आयतों’ के द्वारा चेताया जाय, और फिर वह उनसे मुह फेर ले | निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना हैं |”   (21.32.22)

१२. अल्लाह ने  तुमसे बहुत सी गनीमतों (लूट) का वादा किया है जो तुम्हारे हाथ आयेंगी | (26.48.20)

१३. तो जो कुछ गनीमत (लूट) का माल तुमने हासिल किया है उसे हलाल व् पाक समझ कर खाओ | (10.8.69)

१४.  “हे ‘नबी’ ! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ ‘जिहाद’ करो और उन पर सख्ती करो, और उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है | क्या ही बुरी जगह है |” (28.66.9)

१५. “तो अवश्य हम कुफ्र करने वालों को यातना का मजा चखाएंगे, अवश्य ही हम उन्हें बुरा बदला देंगे उस कर्म का जो वो करते थे | “(24.41.27)

१६. “यह बदला है अल्लाह के शत्रुओं का ‘जहन्नम की आग’ | इसी में सदा उनका घर है, इसके बदले में की हमारी आयतों का इंकार करते थे |” (24.41.28)

१७. “निहसंदेह अल्लाह ने ईमान वालों से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए जन्नत है वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो मारते भी हैं और मरे भी जाते हैं |” (11.9.111)

१८. अल्लाह ने इन मुनाफिक (अर्ध मुस्लिम) पुरूषों और मुनाफिक स्त्रीयों और काफिरों से जहन्नुम की आग का वादा किया है जिसमें वे सदा रहेंगे यहीं उन्हें बसना है | अल्लाह ने उन्हें लानत की और उनके लिए स्थाई यातना है | (10.9.68)

१९. “हे नबी ! ईमान वालों को लड़ाई पर उभारो | यदि तुम बीस भी जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर भी प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, और यदि तुम में सौ हों तो वे एक हजार ‘काफिरों’ पर भारी पड़ेंगे क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ-बूझ नहीं रखते हैं | (10.8.65)

२०. “हे ईमानवालो ! तुम यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र न बनाओ | ये आपस में एक दूसरे के मित्र हैं और जो कोई तुममें से इनको मित्र बनाएगा वो इन्ही में से होगा |”  बेशक अल्लाह जुल्म करने वालों को मार्ग नही दिखाता |(6.5.51)

२१. “ ‘किताब वाले’ जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं न ‘आखिरात’ पर और न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्लाह और उसके ‘रसूल’ ने ‘हराम’ ठहराया है और न वो सच्चे ‘दीन’ को अपना ‘दीन’ बनाते हैं, उनसे लड़ो यहाँ तक कि वो अप्रतिष्ठित होकर अपने हाथ से जिजया देने लगें | (10.9.29)

२२. फिर हमने उनके बीच कियामत के दिन तक के लिए वैमनस्य और द्वेष की आग भड़का दी और अल्लाह जल्द उन्हें बता देगा जो कुछ वो करते हैं | (6.5.14)

२३. वे चाहते हैं की तरह से वे काफ़िर हुए हैं उसी तरह से तुम भी काफ़िर हो जाओ फिर तुम एक जैसे हो जाओ : तो उनमें से किसी को अपना साथी न बनाना जब तक की वे अल्लाह की रह में हिजरत न करें, यदि वे इससे फिर जाएँ तो उन्हें जहा कही पाओ पकड़ो और उनका क़त्ल करो | उनमें से किसी को साथी व् सहायक न बनाना | (5.4.89)

२४. “उन (काफिरों) से लड़ो | अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुक़ाबले में तुम्हरी सहायता करेगा |” (10.9.14)

 

उपरोक्त आयातों से स्पष्ट है कि इनमें ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कपट, लडाई-झगडा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं |इन्ही कारणों से देश व् विदेश में मुस्लिमों व् गैर-मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं |

दिल्ली प्रशासन ने सन १९८५ में सर्वश्री इंद्रसेन शर्मा और राजकुमार आर्य के विरुद्ध दिल्ले के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के अदालत में उक्त पत्रक छापने के आरोप में मुक़दमा किया था | न्यायलय ने ३१ जुलाई को उक्त दोनों महानुभावों को बरी करते हुए निर्णय दिया कि

“कुरान मजीद” की पवित्र पुस्तक के प्रति आदर रखते हुए उक्त आयातों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये आयतें बहुत हानिकारक हैं और घृणा की शिक्षा देती हैं, जिससे मुसलमानों और देश के अन्य वर्गों में भेदभाव को बढ़ावा मिलाने के संभावना होती है |

              हिन्दू रायटर्स फोरम, नई दिल्ली-२७  द्वारा पुनमुद्रित एवं प्रकाशित
 
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