जिहाद और गैर-मुसलमान

 

लेखक :

प्रो. कृष्ण वल्लभ पालीवाल [पीएच. डी.]

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हमारी यह सम्मति है कि जो कोई इस्लाम के अलावा वर्तमान में मौजूद किसी अन्य धर्म जैसे- यहूदीमत, ईसाइयत और अन्य (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म आदि) में विश्वास रखता है, वह गैर ईमानवाला है | उससे पश्चाताप करने के लिए आग्रह करना चाहिए | यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी धर्मत्यागी के समान हत्या कर देनी चाहिए क्योंकि वह कुरान को नकार रहा है |”

——— शेख मुहम्मद-अस-सलेह-अल-उथेमिन

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 इस्लामी जिहाद का सच क्या ?

         वैसे तो भारत पिछले तेरह सौ वर्षों से इस्लामी जिहादी आतंकवाद से दृढ़ता और परमवीरता के साथ जूझता रहा है, मगर 11/09/01 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जिहादी हमले के बाद से सारे विश्व का ध्यान इस्लामी कट्टरता की ओर आकर्षित हुआ है | क्योंकि इस जघन्य कार्य में लिप्त सभी मुसलमान थे, इसलिए विश्व के राजनेताओं, विद्वानों, पत्रकारों का ध्यान इस्लाम की ओर आकर्षित हुआ है | उन्होंने इस घृणित, जघन्य एवं अमानवीय जिहादी काण्ड के लिए इस्लामी धर्मान्धता को दोषी ठहराया जो कि इस्लामी जिहाद के नाम हत्या, हिंसा और आतंकवाद को प्रोत्साहित करती है | दूसरी तरफ ये भी कहा गया है कि इस्लाम तो शांति, प्रेम और भाईचारे का पंथ है | धर्म के नाम पर, इस प्रकार की हिंसा का सच्चे इस्लाम से कोई संबंध नहीं है |

यही बात ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने ईरानी कल्चरल हाउस, दिल्ली में, 27 जनवरी 2003, को कही, कि “महमूद गजनवी आक्रान्ता और दुस्साहसी शासक था | उसके भारत पर 17 हमलों का इस्लाम और उसकी विचारधारा से कोई लेना देना नहीं है | गजनवी ने भारत में जो कुछ भी किया वो इस्लामी संस्कृति और विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता |” (दैनिक जागरण, 28/01/03)

         इन दो विरोधाभासी वक्तव्यों में से सच्चाई को परखने के लिए, यहाँ हमने केवल मुस्लिम विद्वानों द्वारा अनुवादित इस्लाम के धर्म ग्रन्थों – कुरान और प्रामाणिक हदीसों के जिहाद और गैर-मुसलमानों संबंधी उद्धरणों को संकलित कर प्रस्तुत किया है | हमारा निवेदन है कि आप इन्हें गंभीरता एवं निष्पक्ष भाव से स्वयं पढ़ें और अंत में इस बात का निर्णय हम पाठकों पर ही छोड़ते हैं कि क्या इस्लामी जिहादी मुसलमानों को, गैर-मुसलमानों (हिन्दू, बौद्ध, सिख, यहूदी, ईसाई आदि) के प्रति भाई-चारे का संदेश देता है या गैर-मुसलमानों को किसी भी प्रकार इस्लाम में धर्मांतरित कर या समाप्त कर, विश्व में इस्लामी राज्य स्थापित करना चाहता है ? यहाँ हमने सभी आयतें ‘कुरान मजीद’ अनुवादक मुहम्मद फारूख खाँ, प्रकाशक मक्तवा अल-हस्नात, रामपुर (1980) से ली हैं |

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(1)   अल्लाह का मानव समाज को ‘ईमान’ वाले और ‘काफिरों’ में बाँटना :-

 

1. “इन (गैर-मुसलमानों) पर शैतान छा गया है | और उसने ऐसा कर दिया है की ये अल्लाह की याद को भुला बैठे | ये ‘शैतान’ की पार्टी वाले हैं | सुन लो शैतान की पार्टी ही घाटा उठाने वाली है |”    (58:19, पृ. 1018)

2. “वही लोग है जिनके दिलों में उसने ‘ईमान’ अंकित कर दिया है………अल्लाह उनसे राजी हुआ, और वे उससे राजी हुए | ये ईमानवाले ‘अल्लाह की पार्टी’ वाले हैं सुन लो अल्लाह की पार्टी वाले ही सफलता पाने वाले हैं |”   (58:22, पृ. 1019)

3. “और हम में कुछ तो ‘मुस्लिम’ हैं और हममें कुछ मार्ग से फिरे हुए हैं| तो जो मुस्लिम हुए, उन्होने तो भलाई का मार्ग पसंद कर लिया | रहे वे लोग जो मार्ग से फिरे हुए हैं, तो वे ‘जहन्नुम’ का ईधन हुए |” (72:14-15, पृ. 1086)

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(2)  ‘ईमान’ वाले आपस में भाई-भाई :-

 

  1. “और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ो और फूट में न पडो | अल्लाह की कृपा को याद करो जो उसने तुम पर की है : तुम एक दूसरे के शत्रु थे, तो उसने तुम्हारे दिलों को परस्पर एक-दूसरे से जोड़ दिया तो तुम उसके कृपा से भाई-भाई हो गए |”  (3:103, पृ. 201)
  1. “और यदि ‘ईमान’ वालों के दो गिरोह परस्पर लड़ पड़ें तो उनके बीच सुलह-सफाई करा दो |” (49:9, पृ. 950)
  1. ‘ईमान’ वाले तो भाई-भाई हैं | तो अपने भाइयों के बीच सुलह-सफाई करा दो और अल्लाह का डर रखो ताकि तुम पर दया की जाय | “  (49:10, पृ, 950)
  1. “तो यदि ये ‘तौबा’ कर लें और ‘नमाज’ कायम करें और ‘जकात’ दें, तो तुम्हारे दीनी भाई है | और जानने वालों के लिए हम अपनी ‘आयतें’ खोल-खोलकर बयान करते हैं |”  (9:11, पृ. 369)
  1. “मुहम्मद अल्लाह के ‘रसूल’ हैं | जो लोग उनके साथ हैं वे ‘काफिरों’ के मुक़ाबले कठोर और आपस में दयालु है |”  (48:29, पृ. 945)

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(3)   ’ईमान’ न लाने वाले ‘काफिरों’ (गैर-मुसलमानों) को सजा :-

 

1. “जो ‘काफिर’ हैं जालिम वही हैं |” (2:254, पृ. 171)

2. “जो कोई अल्लाह और उसके ‘फरिश्तों’ और उसके ‘रसूलों’ और ‘जिबरील’ और ‘मीकाइल’ का शत्रु हुआ तो ऐसे ‘काफिरों’ का शत्रु अल्लाह हैं |”    (2:98, पृ. 141)

3. “निश्चय ही (भूमि पर) चलाने वाले सबसे बुरे जीव अल्लाह की दृष्टि में वे लोग है, जिन्होंने ‘कुफ़्र’ किया फिर वे ईमान नहीं लाते |” (8:55, पृ. 357)

4. “और इससे बढ़कर जालिम और कौन होगा जिसे उसके ‘रब’ की ‘आयतों’ के द्वारा चेताया जाय, और फिर वह उनसे मुह फेर ले | निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना हैं |”   (32:22, पृ. 376)

5. “और काफिरों के लिए उसने दुखदायिनी यातना तैयार कर रखी है |”   (33:8, पृ. 746)

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 (4)  केवल अल्लाह को पूजो :-

 

 1. “हम तुमसे और अल्लाह के सिवा जिसे भी तुम पूजते हो उससे अलग है | हम तुम्हें नहीं मानते | और हमारे-तुम्हारे बीच सदा के लिए शत्रुता और विद्वेष उभर आया है जब तक कि तुम अकेले अल्लाह पर ‘ईमान’ न लाओ- बस यह है कि इब्रहीम ने अपने बाप से इतनी बात कह दे थी कि में तुम्हारे लिए क्षमा की प्रार्थना अवश्य कर दूंगा और अल्लाह के आगे तुम्हारे लिए कुछ भी करना मेरे बस में नहीं है |” (60:4, पृ. 1030)

2. “वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्गदर्शन और सच्चे ‘दीन’ (सत्य धर्म) के साथ भेजा, ताकि उसे समस्त दीन पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुशरिकों (मूर्ति पूजकों) को यह नापसंद ही क्यों न हो |” (9:33, पृ. 373)

3. पैगंबर ने कहा कि, “अपने बच्चों को प्रशिक्षित करने के लिए उनके मनों में अल्लाह का डर कायम करने के लिए दबाव डालने में कमी       मत करो |”  (मिश्कत, 61)

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(5) अल्लाह और मुहम्मद दोनों पर ईमान लाओ :-

 

1. “ईमान वाले तो बस वे हैं जो अल्लाह पर और उसके ‘रसूल पर ईमान लाए फिर संदेह में नहीं पड़ें , और अपने मालों और अपनी जानों      को अल्लाह की राह में लगा दिया |” (49 :15 पृ. 952 )

2. “अल्लाह और उसके ‘रसूल’ के हुक्म पर चलो, और आपस में झगड़ो, नहीं तो तुम में कमजोरी आ जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी; और धैर्य से काम लो !”  (8:46, पृ॰ 355)

3. “हे वे लोगो ‘ईमान’ लाये हो ! अल्लाह का हुक्म और ‘रसूल’ का हुक्म मानो, और अपना किया-धरा बरबाद मत करो | (47:33, पृ. 934)

4. “यह इसलिए की इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे, तो निःसन्देह अल्लाह भी कड़ी सजा देने वाला है | (8:13, पृ. 351)

5. “कह दो : ‘अल्लाह और रसूल’ की आज्ञा का पालन करो | फिर यदि वे मुंह मोड लें तो जान लें कि अल्लाह काफिरों से प्रेम नहीं करता है | (3:32, पृ. 190)

6. “ईमान लाओ ‘अल्लाह’ और उसके ‘रसूल’ पर |” (57:7, पृ. 1009)

 

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  (6)पैगंबर मुहम्मद पर ईमान लाओ :-

                                 

  1. “ ‘नमाज’ कायम करो और ‘जकात’ दो और ‘रसूल’ का हुक्म मानो ताकि तुम पर दया की जाए |” (24”56, पृ. 632)
  1. “ (हे मुहम्मद) हमने तुम्हें लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा और (इस पर) गवाह की हैसियत से अल्लाह ही काफी है | जिसने रसूल का आदेश माना, वास्तव में अल्लाह का आदेश माना है |” (4:79-80, पृ. 235)
  1. “मुहम्मद तुम्हारे पुरूषों में से किसी के पिता नहीं हैं परंतु वे अल्लाह के ‘रसूल’ और ‘नबियों’ के समापक (यानि आखिरी नबी) हैं |” (33:40, पृ. 754)
  1. “ उसके रसूल पर ईमान लाओ |“ (57;28, पृ. 1013)
  1. “वह जो मुहम्मद पैगंबर मुहम्मद की आज्ञा का पालन नहीं करता है वह अल्लाह की अवज्ञा करता है |” (मिश्कत 144)
  1. “मुहम्मद पैगंबर ने कहा कि तुममें से कोई भी ईमानवाला नहीं है जब तक कि मैं (मुहम्मद) उसे अपने पुत्र, अपने पिता और समस्त जाति से अधिक प्यारा न हो जाऊँ | (मुस्लिम, खण्ड-1: 71, पृ. 37)
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(7)  अल्लाह के अलावा किसी और को मत पूजो :-

             

1. “और अल्लाह के सिवा किसी को न पुकार, जो न तुझे लाभ पहुंचा सके और

 न हानि, यदि तूने ऐसा किया तो तू ज़ालिमों में से होगा |”   (10:106, पृ. 411)

2. “ (कहा जाएगा) ; निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवाय पूजते थे, ‘जहन्नम’ का ईधन हो | तुम अवश्य उसके घाट       उतरोगे |” (21:98, पृ.585)

3. “और अल्लाह को छोडकर वे उसको पूजते है जो न उनको लाभ पहुंचा सकता है न हानि पहुंचा सकता है | और ‘काफिर’ अपने ‘रब’ के मुक़ाबले में (विद्रोहियों का) प्रष्ठ-पोषक बना हुआ है | (25-55, पृ. 644)

4. “निःसन्देह जो लोग ‘ईमान’ लाये फिर ‘कुफ्र’ किया फिर ईमान’ लाये फिर ‘कुफ्र’ किया और फिर ‘कुफ़्र’ में बढ़ते चले गए, अल्लाह उनको कभी क्षमा नही करेगा और न उन्हें राह दिखाएगा |” (4:137, पृ. 246)

5. “निश्चय ही उन लोगों ने ‘कुफ़्र’ किया जिन्होने कहा कि अल्लाह मसीह सुत मरियम ही है, हालांकि मसीह ने कहा था – हे ‘इस्राईल’ की संतान ! अल्लाह की ‘इबादत’ करो जो मेरा ‘रब’ भी है तुम्हारा भी ‘रब’ भी | जो कोई अल्लाह के साथ (किसी को) शरीक करेगा, उस पर अल्लाह ने ‘जन्नत’ हराम कर दी है| और उसका ठिकाना जहन्नम ही है |”  (5:72, पृ. 271)

6. “यह पूछने पर कि अल्लाह की दृष्टि में सबसे बड़ा पाप क्या है ? पैगंबर ने कहा – ‘अल्लाह के साथ किसी को शामिल करना’ | (मुस्लिम, खण्ड -1 : 156, पृ. 60)

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(8)  इस्लाम ही सच्चा धर्म :-

 

  1. ‘दीन’ तो अल्लाह का इस्लाम है | (3:19, पृ. 188)
  1. “जो ‘इस्लाम’ के सिवा कोई और ‘दीन’ चाहेगा तो वह कभी उससे (अल्लाह से) कबूल न किया जाएगा और वह ‘आखिरात’ में टोटा पाने वालों में से होगा |”  (3:58, पृ. 198)
  1. “मैंने तुम्हारे लिए ‘इस्लाम’ को दीन की हैसियत से पसंद किया |” (5:3, पृ. 257)
  1. “जिन लोगों ने ‘कुफ़्र’ किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और ‘काफिर’ रहकर ही मर गए, अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा |” (47:34, पृ. 934)
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(9)  ‘काफिर’ (गैर-मुसलमान) ईमानवालों के शत्रु :-

  1. “निःसन्देह ‘काफिर’ तुम्हारे (इमनवालों के) खुले शत्रु है |” (4:101, पृ. 239)
  1. “निःसन्देह अल्लाह ने काफिरों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है | “ (4:102, पृ. 239)
  1. “हे ‘इमानवालो’ ! ‘मुशरिक’ (मूर्तिपूजक) तो नापाक हैं | तो इस वर्ष के पश्चात ये ‘मस्जिदे हराम’ (काबा) के पास फटकने न पाएँ |” (9:28, पृ. 371)
  1. “मुशरिक स्त्रीयों से जब तक कि वे ईमान न लाये विवाह मत करो | ईमानवाली एक ‘लौंडी’ एक मुशरिक स्त्री से अच्छी है, यद्यपि वह तुम्हें भली लगे | और मुशरिक पुरूषों से अपनी स्त्रीयों का विवाह न करो जब तक वे ईमान न लाएँ | ईमानवाला एक गुलाम एक मुशरिक से अच्छा है, यद्यपि वह भला लगे | (2:221, पृ. 113)
  1. “पैगंबर ने भगवा रंग में रंगे हुए कपड़े पहनने के लिए मना किया | (क्योंकि) ऐसे कपड़े प्रायः गैर-मुसलमानों (हिंदुओं) के द्वारा पहने जाते है | अतः उन्हें मत पहनो, उन्हें जला दो |” (मुस्लिम खण्ड-3, 5173-5175, पृ. 1377-78)
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(10) गैर-मुसलमानों से मित्रता न करो :-

 

1. “ईमानवालों को चाहिए की वे ईमानवालों के विरुद्ध ‘काफिरों’ को अपना संरक्षक-मित्र न बनाए और जो कोई ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई भी नाता नहीं |” (3:28, पृ. 189)

2. “हे ईमानवालो ! अपनों के सिवा दूसरों को अपना भेदी न बनाओ, ये तुम्हें क्षति पहुंचाने में कुछ भी उठा नहीं रखेंगे ……..इनका द्वेष तो इनके मुंह से व्यक्त हो चुका है और जो इनके सीने में छुपाये हुए है वो इससे भी बढ़कर है |” (3:118, पृ. 203)

3. “हे ईमानवालो ! ईमानवालों के मुक़ाबले में ‘काफिरों’ को मित्र न बनाओ | क्या तुम अपने ही विरुद्ध अल्लाह के लिए एक स्पष्ट तर्क संचित करना चाहते हो ? ”  (4:144, पृ. 247)

4. “हे ईमानवालो ! तुम यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र न बनाओ | ये आपस में एक दूसरे के मित्र हैं और जो कोई तुममें से इनको मित्र बनाएगा वो इन्ही में से होगा |”  (5:51, पृ. 267)

5. “हे ईमान लानेवालों ! तुमसे पहले जिनको किताब दी गई थी | जिन्होने तुम्हारे ‘दीन’ को हंसी और खेल बना लिया है उन्हें और ‘काफिरों’ को अपना मित्र न बनाओ तथा अल्लाह से डरते रहो, यदि तुम ईमान वाले हो |”  (5:57, पृ. 268)

6. “हे ईमान लानेवालो ! अपने बापों और अपने भाइयों को अपना मित्र न बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा ‘कुफ़्र’ को पसंद करें | जो कोई तुममें से उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे |” (9:23, पृ. 370)

7. “हे ईमान लाने वालो ! तुम मेरे दुश्मनों को और अपने दुश्मनों को अपना न बनाओ |”  (60:1, पृ. 1029)

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(11)  गैर-मुस्लिमों के प्रति अल्लाह का पक्षपात :-

 

1. “अल्लाह काफिरों को अपने घेरे में लिए हुए है |”  (2:19, पृ. 129)

2. “वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता के लिए खास कर लेता है |” (3:74, पृ. 196)

3. “अल्लाह जालिमों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता | “ (2:258, पृ. 173)

4. “अल्लाह उसका तुमसे हिसाब लेगा फिर जिसे चाहेगा क्षमा करेगा जिसे चाहेगा यातना देगा, अल्लाह को हर चीज का सामर्थ्य प्राप्त है    |”  (2:284, पृ. 179)

5. “अल्लाह उसे मार्ग नहीं दिखाता जो अत्यंत झूठा और ‘कुफ़्र’ करने वाला है |”  (39:3, पृ. 829)

6. “अल्लाह उन लोगों को मार्ग नहीं दिखाता जो अवज्ञाकारी हैं |”  (9:24, पृ. 371)

7. “अल्लाह काफिर लोगों को मार्ग नहीं दिखाता | “  (9:37, पृ. 374)

8. “फिर अल्लाह जिसे चाहता है, भटका देता है और जिसे चाहता है मार्ग पर लगा देता है |”  (14:4, पृ. 464)

9. “फिर हमने उनके बीच ‘कियामत’ के दिन तक के लिए वैमनस्य व द्वेष की एजी भड़का दी |”  (5:14, पृ. 260)

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(12)  गैर-मुसलमानों के लिए अपमान और ‘जहन्नम’ की आग :- 

 

1. “जिन लोगों ने ‘कुफ़्र’ किया और हमारी ‘आयतों’ को झुठलाया वही आग (जहन्नम) में रहने वाले हैं | वे उसमें सदैव रहेंगे |”  (2:39,पृ. 132)

2. “जिन लोगों ने हमारी ‘आयतों’ का इंकार किया, उन्हें जल्द हम अग्नि में झोंक देंगे | जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वाद कर लें |” (4:56, पृ. 231)

3. “जिन लोगों ने ‘कुफ़्र’ किया, यदि उनके पास वह सब कुछ हो जो धरती में है और उतना ही उसके साथ और भी हो | कि वे उसे देकर ‘कियामत’ के दिन यातना से बच जाएँ तब भी उसे कबूल नहीं किया जाएगा | उनके लिए दुखदायिनी यातना है |”  (5:36, पृ. 264)

4. “वे (‘काफिर’) चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से निकाल जायेँ, परंतु वे उससे निकल नही सकेंगे | उनके लिए स्थायी यातना है |”  (5:37, पृ. 264)

5. जिसे अल्लाह मार्ग दिखाये, वही मार्ग पाने वाला है और जिसे वह भटका दे, ऐसे लोगों के लिए उसके सिवा तू किसी को संरक्षक-मित्र नही पा सकता, ‘कियामत’ के दिन उन्हें हम औंधे मुह इस दिशा में घसीट ले जाएंगे कि वे अंधे गूंगे, बहरे, होंगे उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है | जब कभी उनकी आंच धीमी होने लगेगी, हम उसे उनके लिए और दहका देंगे |  (17:97, पृ. 520)

6. “पकड़ो इसको और इसे जकड़ लो, फिर (जहन्नम की) भड़कती आग में इसे डाल दो, फिर एक जंजीर में जो सत्तर हाथ लंबी है, इसे बांध दो | यह महिमाशाली अल्लाह पर ‘ईमान’ नहीं रखता था |”  (69:30-33, पृ. 1071)

7. “(पैगंबर) ने कहा ….. जो जान बूझकर मेरे बारे में झूठ बोलता है उसका ठिकाना ‘जहन्नम’ में हैं |“ (मिश्कत, 198)

8. “(पैगंबर) ने कहा कि मुनाफिक (मुस्लिम) और गैर-मुस्लिम ‘जहन्नम’ में लोहे के हथोड़ों से पीटे जाएंगे | ऐसा घन कि यदि जिससे पहाड़ पर भी चोट की जाय तो वह चूरा बन जाय |”   (मिश्कत, 126-131)

9. “पैगंबर ने कहा कि गैर-मुसलमानों की कब्र पर निन्यानवें अजगरों का आधिपत्य रहता है वे ‘कियामत’ के दिन तक लगातार उसे डसते रहते हैं और नौचते रहते हैं | ये अजगर इतने जहरीले हैं कि यदि इनमें से एक भी पप्रथवी पर फुँकार मार दे तो उस जगह कभी भी कोई वनस्पति नहीं उगेगी |”  (मिश्कत, 134)

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(13) जहन्नम का स्वरूप :-

 

1. “और निश्चय ही ‘जहन्नम’ उन सब के वादे की जगह है | उसके सात द्वार हैं, हर द्वार के लिए उन (लोगों) में से एक निश्चित हिस्सा है |”  (15:43-44, पृ. 477)

2. “वह एक वृक्ष है जो भड़कती हुई आग (जहन्नम) की तरह से निकलता है | उसके गाभे (फसल) ऐसे हैं जैसे शैतानों के सिर | तो ये (जहन्नम के) लोग उसे खाएँगे और उसी से (अपने) पेट भरेंगे | फिर इसके ऊपर से उन्हें खौलता हुआ पानी मिलेगा और उसके बाद इनकी वापिसी उसी भड़कती हुई आग (जहन्नम) की तरफ होगी |”  (37:64-68, पृ. 802-803)

3. “उनके ऊपर आग की छतरियाँ होंगी और उनके नीचे भी (आग की) छतरियाँ होंगी | यही है अल्लाह जिससे अपने बंदों को डराता है तो हे मेरे बंदो मेरा डर रखो |”   (39:16, पृ. 832)

4. हे ईमान लाने वालो ! अपने आप को और अपने लोगों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन मनुष्य और पत्थर हैं जिस पर कठोर और प्रबल ‘फरिश्ते’ नियुक्त है |   (66:6, पृ. 1054)

5. “उन लोगों के लिए जिन्होने अपने ‘रब’ के साथ ‘कुफ़्र’ किया ‘जहन्नम’ की यातना है, और बहुत ही बुरी जगह है जहां पहुंचे ! जब ये उस (जहन्नम) में डाले जावेंगे तो ये उसकी भीषण गूंज सुनेंगे और वह भड़क रही होगी, ऐसा लगता है की जोश के मारे फट पड़ेगी |”   (67:6-8, पृ. 1059)

6. “कदापि नहीं ! निःसन्देह वह ज्वाला फैंकने वाली है जो खींच लेने वाली (पिंडली के) मांस को ; वह हर व्यक्ति को बुलाएगी, जिसने पीठ फेरी और मुंह मोड़ा |”    (70:15-17, पृ. 1076)

7. “मैं जल्द ही उसे सकर (दाह) में झोंक दूंगा | तुम्हें क्या खबर कि सकर (जहन्नम) क्या है ? न रहने देगी, न जाने देगी, शरीर को झुलसा देने वाली है | उस पर उन्नीस नियुक्त हैं हमने उस आग पर रहने वालों को फरिश्ते ही बनाया है |”   (74:26-31, पृ. 1098)

8. “कितने ही चेहरे उस दिन (कियामत) सहमे हुए होंगे, परिश्रम करते थके-थके, दहकती आग में पड़ेंगे, उन्हें एक खौलते श्रोत का (पेय) पिलाया जाएगा, उनके लिए खाने को कुछ न होगा बस एक जरीअ (सूखा कटेदार और जहरीला पौधा) होगा जो न (शरीर को) पुष्ट करेगा और न भूख में कुछ काम आयेगा |”  (88:2-7, पृ. 1154)

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(14)  जिहाद क्या है ?

 

1. ‘जिहाद’ (जान तोड़ कोशिश) करो अल्लाह के (मार्ग में) ठीक-ठीक जिहाद | (22:78, पृ. 601)

2. “अल्लाह की राह में युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह सुनने व जानने वाला है |”  (2:244, पृ. 169)

3. “जो अल्लाह के मार्ग में मारे गए, उन्हें मरा न समझो बल्कि वे अपने ‘रब’ के पास जीवित हैं, रोजी पा रहे है |”  (3:169, पृ. 211)

4. “उसकी (अल्लाह की) राह में तुम ‘जिहाद’ करो ताकि तुम सफल हो जाओ |”   (5:35, पृ. 263)

5. “तो तुम अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो- तुम अपने सिवा किसी और का दायित्व नहीं- और ईमान वालों को भी उसके लिए उभारो !  सकता है अल्लाह ‘काफिरों’ का जोर तोड़ दे |”

6. “पैगंबर से पूछने पर कि सर्वोत्तम काम कौन सा है? तो उसने जबाव दिया ‘अल्लाह में विश्वास’ | उसके बाद क्या? पैगंबर ने कहा ‘अल्लाह के लिए जिहाद’ |”   (मुस्लिम, खंड-1 : 148, पृ. 58)

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(15)  अल्लाह का जिहाद के लिए आदेश :-

 

1. “हे ‘नबी’ ! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ ‘जिहाद’ करो और उन पर सख्ती करो, और उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है |”  (66:9, पृ. 10555)

2. “तो ‘काफिरों’ की बात न मानना, और इस (कुरान) से तुम उनसे बड़ा ‘जिहाद’ करो |”   (25:52, पृ. 643)

3. “तुम पर युद्ध फर्ज किया गया, वह तुम्हें अप्रिय है- और हो सकता है कि एक चीज तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है कि एक चीज तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो | अल्लाह जनता है तुम नहीं जानते |”   (2:216, पृ. 162)

4. “फिर जब हराम महीने बीत जाएँ तो ‘मुशरिकों’ को जहां कही पाओ कत्ल करो, उन्हें पकड़ो, उन्हें घेरो, और हर घात की जगह उनकी तक में बैठो |यदि वे ‘तौबा’ कर लें और ‘नमाज’ कायम करें ‘जकात’ दें तो उनका मार्ग छोड़ दो |”  (9:5, पृ. 368)

5. “हे ईमान वालो ! क्या मैं तुम्हें एक ऐसा व्यापार बताऊँ जो तुमको एक दुख भरी यातना से बचा ले? ‘ईमान’ रखो अल्लाह और उसके ‘रसूल’ पर और ‘जिहाद’ करो अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों से, यह तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम ज्ञान रखते हो | वह तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा और तुम्हें ऐसे बागों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी और अच्छे-अच्छे घरों में, जो सदैव रहने के बागों में होंगे | यह है बड़ी सफलता |” (61:10-12, पृ. 1035)

6. “हे नबी ! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ ‘जिहाद’ करो और उन के साथ सख्ती करो | उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है | क्या ही बुरा ठिकाना है |”   (9:73, पृ. 380)

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(16)  जिहाद का उद्देश्य– अन्य धर्मों को समाप्त कर, सारे विश्व में इस्लामी राज्य स्थापित करना “-

 

1. “और उनसे युद्ध करो जहां तक कि ‘फितना’ शेष न रहे और ‘दीन’ अल्लाह का हो जाय |”  (2:193, पृ. 158)

2. “और तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि ‘फितना’ (उपद्रव) बाकी न रहे और ‘दीन’ (धर्म) का पूरा-का-पूरा अल्लाह के लिए हो जाय |”   (8:39, पृ. 354)

3. “ ‘किताब वाले’ जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं न ‘आखिरात’ पर और न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्लाह और उसके ‘रसूल’ ने ‘हराम’ ठहराया है और न वो सच्चे ‘दीन’ को अपना ‘दीन’ बनाते हैं, उनसे लड़ो यहाँ तक कि वो अप्रतिष्ठित होकर अपने हाथ से जीजाया देने लगें |”  (9:29, पृ. 372)

4. “वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्गदर्शन और सच्चे ‘दीन’ (सत्य धर्म) के साथ भेजा, ताकि उसे समस्त ‘दीन’ पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुशरीकों को नापसंद ही क्यो न हो |”  (9:33, पृ. 373)

5. “सबसे आखिरी वक्तव्य जो मुहम्मद ने दिया था कि “हे अल्लाह ! यहूदियों और ईसाइयों को समाप्त कर दे | वे अपने पैगंबरों की कब्रों पर चर्च (पूजा घर) बनाते हैं | अरेबिया में दो धर्म नहीं रहेंगे | (पहले चार खलीफों के समय यह नीति पूरी तरह अपनाई गई और सभी गैर-मुसलमान अरेबिया से बाहर निकाल दिये गए |)    (मालिक, 511:1588)

6. “ओ अल्लाह ! तूने मुझसे जो वादा किया था वह सब दिला | ओ अल्लाह ! यदि ये थोड़े से मुसलमान मारे गए तो दुनियाँ में तेरी पूजा करने वाला कोई न होगा |”    (मुस्लिम खण्ड-3:4360, पृ. 1158)

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(17)  जिहाद कैसे करें ?

  1. “जो लोग ‘ईमान’ लाये वे अल्लाह के मार्ग में युद्ध करते हैं और जिन लोगों ने ‘कुफ़्र’ किया वे तागूत (मूर्तियों) के मार्ग में युद्ध करते हैं | तो तुम शैतान के साथियों से लड़ो |”   (4:76, पृ. 234)
  1. “तो उनमें से किसी को साथी न बनाना जब तक कि वे अल्लाह की राह में ‘हिजरत’ न करें ; यदि वे इससे फिर जाएँ तो उन्हें जहां कहीं पाओ पकड़ो और उनका वध करो | उनमें से किसी को साथी व सहायक न बनाना |”  (4:89, पृ. 237)
  1. “जो लोग अल्लाह और उसके ‘रसूल’ से लड़ते हैं और धरती में बिगाड़ पैदा करने के लिए दौड़ धूप करते हैं, उनकी यही सजा है कि बुरी तरह कत्ल किए जाएँ या सूली पर चढ़ाये जाएँ, या उनके हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं से कट डाले जाएँ या उनको देश निकाला दे दिया जाय | यह रुसवाई तो उनके लिए दुनियाँ में है | और ‘आखिरात’ में उनके लिए बड़ी यातना है |”  (5:33, पृ. 263)
  1. “तो तुम उन लोगों को जो ‘ईमान’ ला चुके हैं, जमाए रखो | मैं अभी ‘काफिरों’ के दिलों में रौब डाले देता हूँ | तो तुम उनकी गर्दनों पर मारो और उनके हर जोड़ पर चोट लगाओ |”   (8:12, पृ. 350)
  1. “हे ‘ईमान’ वालो जब तुम एक सेना के रूप में ‘काफिरों’ से भिड़ो तो उनसे पीठ न फेरो |”    (8:15, पृ. 315)
  1. “हे नबी ! ईमान वालों को लड़ाई पर उभारो | यदि तुम बीस भी जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर भी प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, और यदि तुम में सौ हों तो वे एक हजार ‘काफिरों’ पर भारी पड़ेंगे क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ-बूझ नहीं रखते हैं |”     (8:65, पृ. 358)
  1. “तो यदि तुम में सौ जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे और यदि तुम में से हजार होंगे तो दो हजार पर अल्लाह के हुक्म से भारी रहेंगे |”     (8:66, पृ. 358)
  2. “उन (काफिरों) से लड़ो | अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुक़ाबले में तुम्हरी सहायता करेगा |”  (9:14, पृ. 369)
  1. “हे ‘ईमान’ लाने वालो ! उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आस-पास हैं | चाहिए कि वे तुम में सख्ती पाएँ |”    (9:123, पृ. 391)
  1. “अब जब ‘कुफ़्र’ करने वालों से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो गर्दनें मारना | यहाँ तक कि जब तुम उन्हें कुचल चुको, तो बंधनों में जकड़ो |”  (47:4, पृ. 929)
  1. “उन लोगों को जो अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं उन्हें मुर्दा न कहो | वे तो जीवित हैं परंतु तुम्हें उनकी अनुभूति नहीं होती |”   (2:154, पृ. 150)
  1. “किसी नबी के लिए यह संभव नहीं कि उसके पास कैदी हो जब तक कि वह धरते में (विरोधी दल को) कुचल कर न रख दे |”  (8:67, पृ. 359)
  1. “तुमने उन्हें कत्ल नहीं किया, बल्कि अल्लाह ने उन्हें कत्ल किया है |”   (8:17, पृ. 351)
  1. “अल्लाह ने मुहम्मद को बताया कि उसने जॉन-दी-बेप्टिस्ट से बदला लेने के लिए सत्तर हजार लोगों का कत्ल किया और उसके नाती से बदला लेने के लिए सत्तर हजार सत्तर का कत्ल करेगा |”

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(18)  गैर-मुसलमानों की बस्तियों का विनाश व देश निकाला जिहाद का अंग :-

 

1. “जब हम किसी बस्ती को विनष्ट करने का इरादा कर लेते हैं तो हम वहाँ के सुखभोगी लोगों को हुक्म देते हैं, फिर वे उसमें अवज्ञा करने लग जाते हैं, तब उस बस्ती पर वह (यातना की) बात साबित हो जाती है, फिर हम उसे बिल्कुल जड़ से उखाड़ फेंकते हैं |”   (17:16, पृ. 509)

2. “और हराम (असंभव) था हर उस बस्ती के लिए (पलटना) जिसको हमने विनष्ट कर दिया था | निश्चय ही वे पलटने वाले न थे |” (21:95, पृ. 584)

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(19) अपने जान-माल सहित जिहाद करो :-

 

1. “अल्लाह के मार्ग में खर्च करो, और अपने अप को तबही में न झोंको |”  (2:195, पृ. 158)

2. “निश्चय ही जो लोग ‘ईमान’ लाये और ‘हिजरत’ की और अल्लाह के मार्ग में अपनी जान और माल से ‘जिहाद’ किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को) जगह दी और सहायता की ; वे एक दूसरे के संरक्षक और मित्र हैं | जो लोग ‘ईमान’ ले आए परंतु ‘हिजरत’ नहीं की तो उनसे तुम्हारा संरक्षण (और मैत्री आदि) का कोई संबंध नहीं है जब तक की वे ‘हिजरत’ न करें | परंतु यदि वे दीन (धर्म) के मामले में तुमसे मदद चाहें तो मदद करनी तुम्हारे लिए आवश्यक है | परंतु किसी ऐसे गिरोह के मुक़ाबले नहीं जिससे तुम्हारी संधि हो |”  (8:72, पृ. 360)

3. “निकाल पडो, चाहे हल्के हो या बोझिल, अपने मालों और जानों के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद करो | यह तुम्हारे लिए अच्छा है यदि तुम जानो |”  (9:41, पृ. 371)

4. “जो लोग अल्लाह और ‘अंतिम दिन’ पर ‘ईमान’ रखते हैं वे कभी तुमसे इसकी इजाजत नहीं मांगेंगे कि अपने माल और अपनी जानों के साथ ‘जिहाद’ न करें | अल्लाह उन लोगों को जानता है जो डराने वाले हैं |”   (9:44, पृ. 376)

5. “जहां तक हो सके तुम लोग (सेना) शक्ति और तैयार बंधे हुए घोड़े उनके लिए तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं, अपने शत्रुओं और इनके सिवा औरों को भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते |”  (8:60, पृ. 357)

6. पैगंबर ने कहा “जो कोई भी जिहाद की सहायता के लिए जितना भी खर्च करता है, अल्लाह उसके बदले पुरस्कार में उससे सात-सौ गुना ज्यादा देगा |” (तिरमिजी, खण्ड-1, पृ. 697)

7. पैगंबर ने कहा “हे लोगो ! घुड़सवारी सीखो, तीरंदाजी सीखो और सावधान रहो | तीरंदाजी का अर्थ है शक्ति | जिसने भी पहले तीरंदाजी सीखी और बाद में छोड़ दी, उसने मेरी अवज्ञा की है |” (माजाह, खण्ड-2, पृ.178)

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(20)  जिहाद के लिए प्रलोभन एवम्‌ प्रेरणा :-

 

  1. “जो भी व्यक्ति चालीस दिन या चालीस रात युद्ध में भाग लेता है उसे जन्नत में हीरा, मूंगा व मोतियों से जडा हुआ सोने का खंभा मिलेगा | वो एक ऐसे महल में रहने का सुख भोगेगा जिसके सत्तर हजार दरवाजे हैं और प्रत्येक दरवाजे में एक-एक हूर उसकी पत्नी के रूप में उसकी सेवा को तैनात होगी |”  (माजाह, खण्ड-2, पृ. 169)
  1. पैगम्बर ने कहा “यदि कोई मनुष्य किसी जिहाद में सिर्फ इतनी देर के लिए भाग लेता है कि जितना समय ऊंटनी का दूध निकालने में लगता है तो वह जन्नत जाने का अधिकारी हो जाता है |”  (माजाह, खण्ड-2, पृ. 173)
  1. पैगम्बर ने कहा कि “ (जिहाद में) एक शहीद ईमान की भड़कीली पोशाक से सुसज्जित होता है, उसकी हूरियों के साथ शादी करा दी जाती है और वह अल्लाह की आज्ञा से अन्य सत्तर लोगों की कियामत के दिन जन्नत भेजने की मध्यस्थता करने का अधिकारी हो जाता है |”   (माजाह, खण्ड-2, पृ. 174)
  1. पैगम्बर ने कहा कि “जो कोई किसी व्यक्ति की (युद्ध में) हत्या कर देता है तो वह मारे गए व्यक्ति की संपत्ति का स्वामी हो जाता है |”   (माजाह, खण्ड-2, पृ. 182)
  1. पैगम्बर ने कहा कि “सभी शहीद हीरा-मोती की बनी सीटों पर अल्लाह के सिंहासन के बिलकुल पास बैठेंगे |”   (हदीस-ए-कुदसी, 16:14)
  1. “एक आदमी जो खजूर खा रहा था, ने पैगम्बर से पूछा “यदि मैं जिहाद में मारा जाऊँ तो कहाँ जाऊंगा? पैगम्बर ने जबाव दिया ‘जन्नत में’ ”| उस आदमी ने खजूर (खाये बिना) फेंक दिया और युद्ध में लड़ा, जब तक कि मारा नहीं गया |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4678, पृ. 1266)
  1. “जो कोई अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने जाता है, उस पर ‘ईमान’ लाता है और अपने पैगम्बर की सच्चाईयों को मानता है, उसकी समस्याओं का सारा जिम्मा अल्लाह ने ले रखा है, उसकी देख रेख की ज़िम्मेदारी अल्लाह की है | वह उसे (मरने पर) या तो जन्नत दिलवा देता है या (जीवित रहने पर) उसे फिर घर उसके वापिस लाएगा, पुरस्कार (अथवा माले गनीमत) सहित |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4626, पृ. 1256)
  1. “अल्लाह के मार्ग में लड़ने पर पाये गए प्रत्येक जख्म ‘कियामत के दिन’ वैसे ही उभरेंगे जैसे लगे थे, उनका रंग खून के रंग का होगा लेकिन उसकी खुशबू कस्तूरी के समान होगी |”   (मुस्लिम, खण्ड-3:4630, पृ. 1257)
  1. “अल्लाह के मार्ग में ‘जिहाद’ के लिए सुबह या शाम को जाना, दुनिया व उसके सभी सुखों से बेहतर पुरस्कार है |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4639, पृ. 1259)
  1. “जन्नत का निवास तलवारों के साये से होता है |”  (बुखारी, खण्ड-4:73, पृ. 55)
  1. पैगम्बर ने कहा “जो व्यक्ति प्रसन्नता से अल्लाह को अपना स्वामी, ‘इस्लाम’ को अपना ‘मजहब’ और मुहम्मद को अपना ‘पैगम्बर’ मन लेता है वह निश्चय ही जन्नत में घुसने का अधिकारी हो जाता है…….फिर भी एक ऐसा कार्य है जो जन्नत में उसकी श्रेणी को सौ गुणी ऊंचा उठा देता है | इस एक श्रेणी की ऊंचाई दूसरे से इतनी अधिक होती है जितनी कि पृथ्वी से लेकर आसमान तक …..वह कार्य क्या है ?……..अल्लाह के मार्ग में जिहाद ! अल्लाह के मार्ग में जिहाद !” (मुस्लिम, खण्ड-3:4645, पृ. 1260)
  1. “पैगम्बर ने कहा कि पंद्रह साल का आदमी (गैर-मुसलमान) से युद्ध करने योग्य है, मगर चौदह का नहीं |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4605, पृ. 1253)
  1. पैगम्बर ने कहा “लड़ाई के मैदान में एक रात भी अल्लाह का सैनिक बनकर, घर बैठे दो हजार वर्ष तक उसकी प्रार्थना करने से बेहतर है |”  (माजाह, खण्ड-2, पृ. 266)
  1. “पैगम्बर ने कहा जो व्यक्ति समुद्री लड़ाई में जो शहीदी पाता है, वह मैदानी लड़ाई में दो शहीदीयों के बराबर होती है |”   (माजाह, खण्ड-2, पृ. 168)
  1. पैगम्बर ने कहा “जिस किसी ने एक घोड़े को केवल जिहाद में इस्तेमाल के उद्देश्य से पाला है तो उसको खिलाये-पिलाये प्रत्येक दाने के बदले अल्लाह उसे एक-एक सद्गुण देगा |”  (माजाह, खण्ड-2, पृ. 172)

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(21)  जिहाद के लिए अल्लाह के पुरस्कारों का आश्वासन :-

 

1. “तो जो लोग सांसारिक जीवन के बदले ‘आखिरत’ का सौदा करें, उन्हें चाहिए कि वे अल्लाह के मार्ग में युद्ध करें | जो अल्लाह के मार्ग में युद्ध करेगा तो चाहे वह मारा जाए या विजयी हो, उसे जल्द हम बड़ा प्रतिदान प्रदान करेंगे |”    (4:74, पृ. 234)

2. “बिना किसी आपत्ति के घर बैठे रहने वाले ‘मोमिन’ और अपने धन और प्राणों के साथ अल्लाह के मार्ग में ‘जिहाद’ करने वाले बराबर नहीं हो सकते | अल्लाह ने बैठे रहने वालों की अपेक्षा, अपने धन और प्राणों से जिहाद करने वालों का एक दर्जा बड़ा रखा है

|”    (4:95, पृ. 238)

3 “और जो कोई अपने घर से अल्लाह और उसके ‘रसूल’ की ओर ‘हिजरत’ करने निकले, फिर उसकी मृत्यु आ जाए, तो उसका प्रतिदान अल्लाह के जिम्मे हो गया |”  (4:100, पृ. 239)

4. “जो लोग ‘ईमान’ लाए और ‘हिजरत’ की और अल्लाह की राह में अपने माल और अपनी जानों से ‘जिहाद’ किया, अल्लाह के यहाँ (उनके लिए) बड़ा दर्जा है | और वही हैं जो सफलता प्राप्त करने वाले हैं | उन्हें उनका ‘रब’ शुभ-सूचना देता है, अपनी द्यालुता और रमाजन्दी की, और ऐसे बागों (जन्नत) की जिनमें उनके लिए स्थायी सुख हैं उनमें वे सदैव रहेंगे | निसंदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला (इनाम) है |”   (9:20-22, पृ. 370)

5. “और जिन लोगों ने अल्लाह के मार्ग में घर-बार छोड़ा, फिर कत्ल कर दिए गए या मर गए, अल्लाह उन्हे अच्छी रोजी प्रदान करेगा |”  (22:58, पृ. 598)

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(22) अल्लाह का जिहादी के जीवित बचने पर लूट का माल देने का आश्वासन :-

 

1. “और जान लो कि जो चीज ‘गनीमत के रूप में तुमने प्राप्त की है, उसका पाँचवाँ भाग अल्लाह का, रसूल और रसूल के नातेदारों का और अनाथों, मुंहताजों और मुसाफिरों का है |”  (8:14, पृ. 354)

2. “और उसने तुम्हें उनकी धरती, उनके मालों और घरों का वारिस बना दिया और उस भूमि का भी, जिस पर तुमने पग नहीं रखा |”   (33:27, पृ. 354)

3. “अल्लाह अपने ‘रसूल’ को बस्ती वालों से जो कुछ ‘फै’ (बिना लड़े प्राप्त माले- ग़नीमत) प्राप्त कराए, वह अल्लाह का हक हैं और ‘रसूल’ के नातेदारों, यतीमों, मोहताजों और मुसाफिरों का ताकि, वह माल तुम्हारे मलदारों के ही बीच चक्कर न खाता रहे | रसूल तुम्हें जो कुछ दें उसे ले लो और जिस चीज से तुम्हें रोक दे, उससे रुक जाओ |”    (59:7, पृ. 1023)

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(23)  अल्लाह का जिहाद में मारे गयों के लिए ‘जन्नत’ में भोग-विलास का आश्वासन :-

 

1.  “निस्संदेह अल्लाह ने ‘ईमान’ वालों से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है की इनके लिए ‘जन्नत’ है : वे आल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो वे मारते भी हैं तो मारे भी जाते हैं | यह अल्लाह के जिम्मे (जन्नत का) एक पक्का वादा है ‘तौरत’, ‘इंजील’ और ‘कुरान’ में | और अल्लाह से बढकर अपने वादे को पूरा करने वाला कौन हो सकता है |”   (9:111, पृ. 388

2. “यदि तुम अल्लाह के मार्ग में मारे गए या मर गए तो अल्लाह की क्षमा और दयालुता उन सब चीजों से उत्तम है जिन्हें ये लोग इकठ्ठा करते हैं | चाहे तुम मारे या मारे गए अल्लाह ही के पास इकट्ठे किए जाओगे |”   (3:157-158, पृ. 209)

3. “जो हमारी आयतों पर ‘ईमान’ लाए और ‘मुस्लिम’ थे – दाखिल हो जाओ ‘जन्नत’ में पूरी खुशियों के साथ तुम और तुम्हारे संघाती (पत्नियाँ) | उस ‘जन्नत’ वालों के आगे सोने की तश्तरियाँ और प्याले गर्दिश करेंगे और वहाँ हर चीज होगी आत्माएँ जिसे चाहें और आँखें जिससे लज्जित पाएँ और तुम उसमें सदैव रहोगे और यह वह जन्नत है, जिसके तुम वारिस बन गए उन कर्मो के बदले में जो तुम करते थे | तुम्हारे लिए यहाँ बहुत से मावे हैं जिन्हें तुम खाओगे |” (43:69-73, पृ. 897)

4. “हमने दे रखा है उन्हें मेवे और मांस जैसा वे चाहते हैं …….उनके पास उनके सेवक लड़के आ जा रहे हैं, वे ऐसे (सुंदर) हैं जैसे धराऊ (छिपे) मोती |”  (52:24, पृ. 973)

5. “और जो सब्र उन्होने किया था उनके बदले में उन्हें जन्नत और रेशमी वस्त्र प्रदान किए गए ……..उयनके पास ऐसे लड़के आ जा रहे हैं जिनकी अवस्था ऐक जैसी रहेगी, तुम उन्हें देखोगे तो समझोगे जैसे मोती बिखरे हुए हैं |”    (76:12-19, पृ. 1110)

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(24)  इस्लामी ‘जन्नत’ का स्वरूप :-

 

  1. “उसके लिए जानी-बूझी रोजी हैं, मेवे | उनका सम्मान किया जाएगा नेमत-भारी ‘जन्नतों’ में तख्तों पर आमने-सामने बैठे होंगे ; निथरी बहती (शराब के स्रोत) से मद्य पात्र भर-भर कर उनके बीच फिराये जाएंगे | उज्जवल, पीने वालों के लिए आस्वाद, न उसमें कोई खराबी होगी और न वे उससे मतवाले होंगे और उनके पास निगाहें बचाने वाली, (लजीली) सुंदर आँखों वाली स्त्रियाँ होंगी ऐसी (निर्मल) मानो छिपे हुए अंडे |”   (34:41-49, पृ. 801)
  1. “डर रखने वालों के लिए निश्चय ही अच्छा ठिकाना है, सदैव रहने की ‘जन्नतें’, जिनके द्वार उनके लिए खुले हुए होंगे, उनमें वे तकिया लगाए बैठे होंगे, वहाँ वे खूब मेवे और पेय मँगवाते होंगे और उनके पास निगाहें बचाए रखने वाली (लजीली) सामायु स्त्रीयां होंगी | यह है वह कुछ जिसका, ‘हिसाब का दिन’ के लिए तुमसे वादा किया जा रहा हैं | यह हमारा दिया हुआ है जिसका कभी अंत नहे होगा | ”  (38:49-54, पृ. 823-824)
  1. “निश्चय ही अल्लाह का डर रखने वाले ऐसे स्थान में होंगे जहां कोई खटका न होगा | बागों और जल-स्रोतों के बीच पतले और गाढ़े वस्त्र पहनेंगे, और ऐक दूसरे के आमने-सामने होंगे | यह होगा ! हम उनका विवाह बड़ी और सुंदर आँखों वाली परम रूपवती स्त्रियों से करेंगे | वे वहाँ निश्चिंतता पूर्वक हर प्रकार के मेवे तलब करते रहेंगे | वहाँ वे मृत्यु का मजा कभी न चखेंगे, बस पहली मृत्यु (दुनियाँ) में जो आ चुकी वह आ चुकी |”  (44:51-57, पृ. 907-908)
  1. “उस ‘जन्नत’ का हाल यह है कि जिसका वादा डर रखने वालों से किया गया है, उसमें पानी की नहरे हैं जिसमें सड़ायँध नहीं, और दूध की नहरें हैं जिनका मजा बदला नहीं, और शराब की नहरें हैं जो पीने वालों के लिए स्वादिष्ट हैं | साफ-सुथरे शहद की नहरें है ; और उनके लिए वहाँ हर प्रकार के फल है और क्षमा उनके लिए ‘रब’ की ओर से |” (47:15, पृ. 931 )
  1. “और जो कोई अपने ‘रब’ के आगे खड़े होने से डरा, उसके लिए दो उद्यान हैं ,…..वे फैली हुई टहनियों वाले है |…..इनमें दो स्रोत प्रवाहित हैं ……इनमें हर मेवे दो-दो प्रकार के हैं |….वे ऐसे बिछोनों पर तकिया लगाए हैं जिनके अन्दर के हिस्से दबीज़ रेशम के हैं और इन उद्यानों के फल नीचे लटक रहे हैं |…..इनमें निगाह बचाए रहने वाली (लज्जावती) स्त्रियाँ हैं जिन्हें इनसे पहले न किसी मनुष्य ने हाथ लगाया और न किसी ‘जिन्न ने …..(सुन्दरता में) मानो वे लालमणि और प्रबाल हैं |…इनके सिवा दो उद्यान और भी है …..वे बहुत ही हरे–भरे हैं …..इनमें दो उबलते स्रोत हैं …..इनमें मेवे और खजूर और अनार हैं …..इनमें भली और सुन्दर स्त्रियाँ हैं …सुन्दर आँखों वाली (मृगनैनी) परम रूपवती स्त्रियाँ हैं खेमों के भीतर ठहरी रहने वाली …..जिन्हें इनसे पहले न किसी मनुष्य ने हाथ लगाया है और न किसी जिन्न ने …..वह हरी-भारी मसनदों और अच्छे– अच्छे कालीनों पर टेक लगाए हुये हैं, बताओ तुम अपने ‘रब’ के कौन से चमत्कार को झुठलाते हो ?”    (55:46-77, पृ. 997-998)
  1. “निस्संदेह दर रखने वालों के लिए सफलता है बाग हैं, अंगूर और नवयुवतियाँ समान आयु वाली और छलकता मद्यपात्र, वे वहाँ कोई बकवाद नहीं सुनेंगे और न कोई झूठ बदला है तुम्हारे रब की ओर से—पुरस्कार हिसाब से |”       (78:31-36, पृ. 1120)
  1. “पैगम्बर ने कहा – जन्नत में प्रत्येक आदमी की दो-दो पत्नियाँ होंगी | उसने यह भी कहा – जो भी जन्नत में प्रवेश करेंगे उनके चहरे आसमान में सितारों की तरह चमकीले होंगे | वे न पैशाब करेंगे, न पखना, न थूकेंगे और न ही वे किसी बीमारी से ग्रसित होंगे | उनके पसीने में कस्तूरी की सुगंध होगी | उनकी पत्नियाँ बड़ी-बड़ी आँखों वाली कुमारियाँ होंगी | वे स्वयं एक जैसे होंगे अपने पूर्वजों की तरह साठ क्यूविट यानी 100 फुट लंबे होंगे |”   (मुस्लिम, खंड-4:6793-95, पृ. 1781-82)
  1. “पैगम्बर ने कहा – जन्नत में प्रत्येक आदमी की दो-दो पत्नियाँ होंगी जिनमें आपस में विवाद नहीं होगा और उनके दिलों में नफरत नहीं होगी | जब उनसे पूछा गया कि जब पखना नही होगा तो खाये गए खाने का क्या होगा ? तो पगम्बर ने जबाव दिया कि उनका भोजन डकार लेने से पच जाएगा |”   (मुस्लिम खण्ड-4:6797-98, पृ. 1782-83)
  1. “पैगम्बर ने कहा– जन्नत में तुम कभी बीमारी नहीं होगे | तुम वहाँ सदा रहोगे और तुम्हें कभी मृत्यु नहीं आएगी | तुम वहाँ सदा जवान रहोगे और कभी बूढ़े नहीं होंगे, तुम वहाँ संपन्नता के साथ रहोगे और कभी अभाव गृस्त नहीं होंगे |”     (मुस्लिम खण्ड-4:6805, पृ. 1785)
  1. “पैगम्बर ने कहा– जन्नत में एक खोहकले मोती का शामियाना होगा, जो लंबाई-चौड़ाई में साठ-साठ मील का होगा ताकि उसके प्रत्येक कोने पर ‘ईमान’ वालों का एक-एक परिवार दूसरों के निगाह से दूर रह सके |”  (मुस्लिम, खण्ड-4:6805, पृ. 1785)
  1. “जन्नत में प्रत्येक पुरूष को एक सौ पुरूषों के बराबर वीर्यवत्ता (शक्ति) दी जाएगी |” (तिरमिजी, खण्ड-2, पृ. 138)
  1. “प्रत्येक पुरूष जो जन्नत में प्रवेश करेगा, मरते समय उसकी कोई भी उम्र क्यों न रही हो वह वहाँ तीस वर्ष का हो जाएगा और फिर बुढ़ापा नहीं आयेगा | उसे बहत्तर हूरियां (सुंदरियां) दी जाएंगी |”    (तिरमिजी, खण्ड-2, पृ. 35-40)
  1. “पैगम्बर मुहम्मद ने आयशा को कहा कि कियामत के दिन लोग नंगे बदन, नंगे पाँव और बिना खतना किए एक स्थान पर जमा किए जाएंगे | अयशा ने पूछा कि वहाँ स्त्रीयां और पुरूष सभी नंगे और एक दूसरे की ओर देखेंगे ? तब पैगम्बर ने जबाव दिया कि उनका एक दूसरे की ओर देखना तो गंभीर मामला होगा |”  (मुस्लिम, खण्ड-4:6844, पृ. 1791)

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(25)  जिहाद न करने वाले मुसलमानों को अल्लाह की फटकार :-

 

  1. “हे ‘ईमान’ लाने वालो तुम्हें ! क्या हो गया कि जब तुमसे कहा गया कि अल्लाह के मार्ग में निकालो, तो तुम धरती पर ढह गए | क्या तुम ‘आखिरत’ को छोडकर सांसारिक जीवन पर राजी हो गये ? तो सांसरिक जीवन की सुख सामिग्री ‘आखिरात’ की अपेक्षा बहुत थोडी है |”   (9:38, पृ. 374)
  1. “यदि तुम न निकलोगे तो अल्लाह तुम्हें दुख देने वाली यातना देगा, और तुम्हारी जगह किसी और गिरोह को ले आयेगा तब तुम अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगड़ सकोगे |”  (9:39, पृ. 374)
  1. उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि इस्लामी जिहाद का उद्देश्य एक तरफ मुसलमानों में (आपस में) भाई-चारा, प्रेम व कठोर इस्लामी अनुशासन लाना है तो वही दूसरी तरफ गैर-मुसलमानो को साम-दाम-दंड-भेद से इस्लाम स्वीकार कराकर या उनकी ह्त्या करके सारे विश्व में इस्लामी शासन स्थापित करना है |

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(26)  स्वयं पैगंबर मुहम्मद द्वारा जिहादी युद्ध के आदर्श  :-

 

1. “इमाम नाबावी के अनुसार बयासी हमलों में से छब्बीस ‘गजाबर’ थे यानी जिनमें स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने नेत्रत्व किया बाकी छप्पन ‘सराया’ थे यानी जिसमें  पैगम्बर मुहम्मद के नियुक्त किए गए व्यक्तियों ने हमलों का नेत्रत्व किया | पैगम्बर के मदीना में रहते समय में (622-632 ईसवी) औसतन हर एक पैंतालीस दिन में एक हमला हुआ |”  (नोट स. 2283, मुस्लिम, 4469-70, पृ. 1211, खण्ड-3)

2. “पैगम्बर मुहम्मद ने कहा – अल्लाह की राह में और अल्लाह के लिए युद्ध करो | उनके विरुद्ध युद्ध करो जो अल्लाह पर ‘ईमान’ नहीं लाते | माले-गनीमत में गड़बड़ी मत करो और पवित्र युद्ध करते रहो | जब तुम्हारा मुक़ाबला शत्रुओं से हो जो बहुदेवतावादी हैं तो उनके सामने तीन विकल्प रखो- पहला उनको इस्लाम अपनाने को कहो, यदि वे मान जाएँ तो उन्हें अपना लो | फिर उनको अपना देश छोड़कर मुजाहिदों के देश मदीना आने को कहो (क्योंकि मुहम्मद ने मदीना में रहने के लिए कहा ; प्रारम्भिक दिनों में किसी का मदीना में आकर रहना इस्लाम स्वीकारने का स्वरूप समझा जाता था), यदि वे इस्लाम स्वीकार न करें तो उनसे जिजया मांगो, यदि जिजया भी न दें तो अल्लाह से मदद मांगो और उनसे युद्ध करो |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4294, पृ. 1137)

3. “ऐसी ही तीन शर्तों का प्रस्ताव हदीस इब्र-ए-माजाह (खण्ड-2, पृ. 188-89) में इस प्रकार दिया गया है : जब तुम किसी शत्रु (गैर-मुस्लिम) से मिलो तो उसके सामने तीन प्रस्ताव रखो –

(1)    उन्हें इस्लाम कबूल करने के लिए कहो जिसका वास्तविक अर्थ मुहम्मद का नेत्रत्व स्वीकारना है |

(2)    यदि वे इस शर्त को न माने तो उन्हें आत्मसमर्पण सहित जिजया देना होगा |

(3)    यदि वे इन दोनों विकल्पों को भी न मानें तो उनके साथ निर्दयता के साथ युद्ध करो |”

4. “पैगम्बर मुहम्मद ने कहा कि वह माही यानी गैर मुसलमानों का विनाशक है |अल्लाह मेरे माध्यम से सभी गैर मुस्लिमों का विनाश कर देगा |”      (मालिक मुवट्टा       594, 1831)

5. “पैगम्बर ने कहा – अल्लाह के लिए प्यार सर्वोत्तम कार्य है |”    (मिश्कत, 32)

6. “मुहम्मद ने कहा- मैं अल्लाह के मार्ग में लड़ना और मारा जाना पसंद करता हूँ  तथा लड़ना, फिर मारा जाना पसंद करता हूँ, बार-बार लड़ना और मारा जाना पसंद करता हूँ |”     (मुस्लिम, खण्ड-3:4626, पृ. 1256)

7. “मैं अरेबिया प्रायद्वीप से सभी यहूदियों और इसाइयों को बाहर निकाल दूंगा |” पैगम्बर मुहम्मद ने (उमर को) घोषणा करते हुए कहा |  (मुस्लिम, खण्ड-3, पृ. 1162-1163)

8. “पैगम्बर मुहम्मद ने सबसे पहले बानू नजिर क़बीले को मदीना से निकाला और कुरेजिया कबीले को रहने दिया और उन्हें तब तक संरक्षण दिया जब तक कि वे उनके विरुद्ध नही लड़े | तब उसने उनके पुरूषों को कत्ल कर दिया और उनकी स्त्रियों, बच्चों व संपत्ति को मुसलमानों में बाँट दिया …….अल्लाह के रसूल ने मदीना के सभी यहूदियों को बाहर निकाल दिया | बानू कैनूका और बानू हरीथा, के यहूदियों को और जो कोई यहूदी मदीना में बचा उस सबको बाहर निकाल दिया | ऐसा हमें उमर के पुत्र अब्दुल्ला ने बताया |”  (मुस्लिम, खण्ड-3:4346, पृ. 1161)

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तलवार द्वारा इस्लाम प्रसार का विद्वानों व आक्रांताओ द्वारा पुष्टि :-

इस सत्य को इस्लाम के विद्वानों ने भी माना है कि पैगम्बर मुहम्मद ने अल्लाह के नाम पर तलवार से इस्लाम का विस्तार किया | मौलाना अबुक आला मैदूदी ने अपनी पुस्तक “अल-जिहाद-फिल-इस्लाम” में लिखा हैं :

     “रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तेरह वर्ष तक अरब वासियों को इस्लाम की ओर बुलाते रहे | उपदेश करने का जो भी प्रभावी ढंग हो सकता था उसे अपने अपनाया | प्रबल प्रमाण और प्रत्यक्ष तर्क उनके उनके सम्मुख रखे | वाणी की मधुरता, भाषा की भावुकता तथा ओजस्वी भाषणों द्वारा ह्रदयों को द्रवित करने का प्रयत्न किया | अल्लाह की ओर से अलौकिक चमत्कार दिखाये, अपने पवित्र जीवन चरित्र का श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किया और कोई ऐसा साधन नही छोड़ा जो सत्य को प्रत्यक्ष और प्रतिस्थापित करने में सहायक हो सकता था |

     परंतु आपकी कौम ने आपकी सच्चाई सूर्य की भांति प्रमाणित करने के पश्चात भी आपके निमंत्रण को स्वीकार करने से इंकार कर दिया | उपदेश और शिक्षा की असफलता के बाद अपने हाथ में तलवार उठाई जिससे लोगों के दिलों से धीरे-धीरे बुराई और शरारत की जंग छूटने लगी | शरीर से हानिकारक तत्व स्वतः ही बाहर निकाल आए और आत्मा की संकीर्णता दूर हो गई और केवल यही नहीं कि आँखों से अंधकार का पर्दा उठाकर सत्य का प्रकाश पूरी तरह प्रकट हो गया बल्कि गर्दनों में अकड़ व मस्तिष्क का घमण्ड, जो सत्य के उदयोपरांत भी मानव को उसके झुकने से रोकता है, शेष न रहा | अरब की भांति दूसरे देशों में भी इतनी तेजी से फैला कि एक शताब्दी के अंदर संसार का एक चौथाई भाग मुसलमान बन चुका था | इसका मूल कारण यही था कि इस्लाम की तलवार ने अंधकार के वे सारे आवरण छिन्न-भिन्न कर दिये जो दिलों में भरे पड़े हुए थे |”        (शांति का अवतार, प्रकाशक, नाजिर नशर-रे-इशाअत, कड़ियाँ, पृ. 7-8 से)

तैमूर लंग ने 1398-99 में भारत पर जो हमले और कत्लेआम किए उसकी प्रेरणा कुरान थी | ऐसा तैमूर मे अपनी जीवनी “मुल-फुजात-ई-तिमुरी” में स्वयं स्वीकारा है :

“उसी समय मेरे मन में एक अभिलाषा आई कि मैं गैर-मुसलमानों के विरुद्ध एक अभियान प्रारम्भ करूँ और गाजी बन जाऊँ क्योंकि मेरे मन में एक बात पहुंची थी कि अविश्वासियों का कातिल गाजी हो जाता है | और यदि वह स्वयं मारा जाता है तो शहीद हो जाता है | इसी कारण मैंने एक निश्चय किया किन्तु मैं अपने मन में अनिश्चित था कि चीन के अविश्वासियों की ओर प्रारम्भ करूँ अथवा भारत के अविश्वाशियों और बहुदेवतावादियों की ओर | इसी उद्देश्य से मैंने कुरान से शकुन खोजना चाहा और जो आयात निकली वो इस प्रकार थी, “ऐ पैगम्बर ! अविश्वासियों (गैर-मुसलमानों) के विरुद्ध युद्ध करो और उनके प्रति कठोरता का व्यवहार करो | “(कुरान मजीद, सूरा 66, आयात 9) मेरे महान अफसरों ने बताया कि हिंदुस्तान के निवासी अविश्वासी और बहुदेवतवादी हैं | सर्वशक्तिमान अल्लाह के आदेशानुसार आज्ञापालन कराते हुए मैने उनके विरुद्ध अभियान की आज्ञा दे दी |”    (तैमूर की जीवनी, एवं इलियट और डाउसन, खण्ड 3, पृ. 394-95)

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ब्रिगेडियर एस. के. मलिक ने तो अपनी पुस्तक ‘कुरानिक कांसेप्ट ऑफ वार’ में जिहाद संबंधी युद्ध के सभी पहलुओं का, कुरान के अनुसार, विस्तृत विवेचन किया है |

 अँगरेजी शब्द कोषों एवं विश्व कोषों में जिहाद का अर्थ :-

‘जिहाद’—“इस्लाम के नाम पर धार्मिक कर्तव्य के रूप में लड़ा जाने वाला एक पवित्र युद्ध है | यह कठोर प्रयास या युद्ध क्रिया, पवित्र युद्ध की भावना से की जाती है |”

…….(वेबेस्टर्स थर्ड न्यू इंटरनेशनल डिक्शनरी, पृ. 1216)

‘जिहाद’—“मुसलमानों के लिए पवित्र कर्तव्य के रूप में किए जाने वाल एक धर्म युद्ध है |”  ……….(दी रेंडम हाउस डिक्शनरी ऑफ दी इंगलिश लैंग्वेज़, पृ. 1029)

 ‘जिहाद’—“एक पवित्र युद्ध है जिसकी मान्यता इस्लाम ने उनके विरुद्ध दी है जो इसकी शिक्षाओं को नहीं मानते हैं |”  …..(कॉलिन्स कोबिल्ड इंगिलिश लैंग्वेज़ डिक्शनरी, पृ. 781)

 ‘जिहाद’—“इस्लाम की तरफ से एक कर्तव्य के रूप में लड़ा जाने वाला पवित्र युद्ध है”…..(लोंगमैन डिक्शनरी ऑफ दी इंगलिश लैङ्ग्वेज,पृ. 849) 

‘जिहाद’—“शब्द अरबी भाषा की एक क्रिया है जिसक अर्थ है संघर्ष एवं लगातार प्रयास करना ; तथा इस्लामी सभ्यता के इतिहास में इस्लाम धर्म के विरोधियों व गैर-मुसलमानों तथा मुस्लिम समाज एवं राज्य के विरोधियों के विरुद्ध युद्ध करना है | प्रारम्भिक इस्लामी इतिहास में जिहाद का अर्थ होता था पवित्र युद्ध और कठोर इस्लामी तथ्यानुसार इसका सीधा संबंध मुसलमानों के हथियारों द्वारा इस्लामी पंथ का प्रसार करने से है | यह खरीजितियों (एक कबीला) जो की युद्ध प्रिय विद्रोहियों का एक दल था, का कर्तव्य था और जिहाद को आदेश या अनिवार्य कर्तव्य समझा जाता था और उयनकी दृष्टि में यह इस्लाम का छटा स्तम्भ था |”   (कौलीयर्स ऐन्साइल्कोपीडिया, खण्ड 13, पृ. 7)

जिहाद के बारे में इसी प्रकार का विवरण ‘दी न्यू ऐन्साइल्कोपीडिया, खण्ड 6’, “दी कैम्ब्रिज ऐन्साइल्कोपीडिया, (पृ. 637)”, “एकेमेडिकन अमेरिकन ऐन्साइल्कोपीडिया (पृ. 418)” तथा “कोन्साइज ऐन्साइल्कोपीडिया ऑफ इस्लाम (पृ. 209)” में भी दिया गया है |

सार के रूप में, गैर-मुसलमानों के प्रति जिहाद की अवधारणा को समझने के लिए इस्लाम के विद्वान पी. टी. ह्यूज़ की “डिक्शनरी ऑफ इस्लाम” में दी गई ‘जिहाद’ की परिभाषा को यहाँ प्रस्तुत करना उपयोगी होगा |

    “इस्लाम के सर्व सत्तात्मक स्वरूप का सुस्पष्ट दर्शन जिहाद की अवधारणा की अपेक्षा और कहीं साफ दिखाई नहीं देता | यह एक धर्म युद्ध है जिसका अंतिम उद्देश्य समस्त विश्व को जीतना फिर उसे एक सच्चे पंथ तथा अल्लाह के कानून के हवाले कर देना है | सत्य केवल इस्लाम को ही दिया गया है ; इसके बाहर मोक्ष की कोई संभावना नहीं है | प्रत्येक ईमान वाले (मुसलमान) का यह पवित्र कर्तव्य और आवश्यक धार्मिक कार्य है की वे समस्त मानवजाति तक इस्लाम को पहुंचाएँ जैसा की कुरन व हदीसों में सुनिश्चित किया गया है | जिहाद एक दैवी सिद्धहंत है जिसका उद्देश्य विशेषकर इस्लाम का प्रसार करना है | मुसलमानों को अल्लाह के नाम प्रयास, युद्ध और हत्या करनी चाहिए |”     (पृ. 243 से अनूदित)

 

विद्वानों की दृष्टि में इस्लामी जिहाद :-

  1. मुस्लिम विद्वान अनवर शेख का कथन है कि – ‘इस्लाम में जिहाद की अवधारणा को “अल्लाह के मार्ग में पवित्र युद्ध” एवं “गैर-ईमान वालों (गैर-मुसलमानों)” के विरुद्ध एक रक्षात्मक संघर्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है इन दोनों कथनों में से किसी में कुछ भी सच्चाई नहीं है | इतिहास साफ तौर पर बतलाता है कि यह पूरी तरह से उन गैर-मुसलमानों के विरुद्ध एक आक्रामक युद्ध है जो कि इस्लामी पंथ को नही स्वीकारते हैं जो कि अपनी इच्छानुसार ईश्वर की पूजा करना चाहते हैं | लेकिन यह सब अल्लाह को स्वीकार नही जो कि किसी अन्य धर्म के अस्तित्व को नही मानता है और तीव्र उत्कंठा के साथ सभी अन्य पंथों को उनके अनुयायियों सहित नष्ट करना चाहता है |  (दिस इज जिहाद, पृ. 1)

 पुनः “जिहाद का मतलब नरसंहार, अंग-विकृतिकरण और विपत्ति है, न कि यह किसी प्रकार के नैतिक, सामाजिक अथवा मानव    कल्याणकारी सेवा के लिए है, जैसा कि मुस्लिम धार्मिक नेता दावा करते हैं |”      (दिस इज जिहाद, पृ. 5)

2. जैक्यूस एलाह का कहना है कि –“जिहाद एक आवश्यक कर्तव्य है | यह उन कर्तव्यों का एक अंग है जिन्हें कि एक ईमान वाले (मुसलमान) को अवश्य पूरा करना चाहिए | यह इस्लाम के धर्म प्रचार का एक सामान्य तरीका है |”

(बेटयोर्स की पुस्तक “दि डिल्क्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी, पुस्तक के प्राक्कथन से” पृ. 19)

 3. अयातुल्ला खुमैनी के अनुसार –“जिहाद का अर्थ है गैर-मुसलमानों के प्रदेशों को जीतना ……इस युद्ध में विजय के लिए, इसका अंतिम उद्देश्य प्रथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक कुरानी कानून का प्रभुत्व लाना है |”     (जिहाद इन वेस्ट, ले. पॉल फ्रेगोसी, पृ. 20)

 4. मैक्सिन रेडिन्सन का मत है कि –“कुछ ऐसे शब्द हैं जो लोगों को आतंकित कर देते हैं | जिहाद उनमें से एक है | जब सार्वियन नेता बोस्निया की सेना पर शैतानीयत लाना चाहते हैं तो घोषणा कर देते हैं कि आलीजा इजेट बेगोबिक (बोस्निया का मुस्लिम नेता) ने पवित्र युद्ध जिहाद, जो कि इस्लाम का भयकारी हथियार है, का ऐलान कर दिया है |” (इस्लाम का विशेषज्ञ, ‘ली मोंडे’ पैरिस के 17/6/1994 के अंक से) |

5. मुसलमानों के जिहाद संबंधी विचारों को शेख मुहम्मद-अस-सलेह-अल-उथेमिन, के शब्दों (दी मुस्लिम विलीफ पृ. 22) में इस प्रकार कहा गया है –

हमारी यह सम्मति है कि जो कोई इस्लाम के अलावा वर्तमान में मौजूद किसी अन्य धर्म जैसे- यहूदीमत, ईसाइयत और अन्य (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म आदि) में विश्वास रखता है, वह गैर ईमानवाला है | उससे पश्चाताप करने के लिए आग्रह करना चाहिए | यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी धर्मत्यागी के समान हत्या कर देनी चाहिए क्योंकि वह कुरान को नकार रहा है |”

6. जिहाद के बारे में सहीह बुखारी का मत है कि –“अल्लाह की प्रशंसा है कि उसने अल-जिहाद (अल्लाह के उद्देश्य के लिए लड़ने) का आदेश दिया –

  • हृदय से (भावना और उद्देश्यों सहित)
  • हाथ से (हथियारों से)
  • वाणी से (प्रवचन, विवेचन, प्रचार आदि से)

अल्लाह के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए और जिसने उसे जिहाद को क्रियान्वित किया उसे जन्नत के बागों में बड़े-बड़े कमरों सहित उसे पुरस्कृत किया जाएगा |”   (22-44, खंड-1)

 7. जिहाद के विषय में आधुनिक विद्वान रूडोल्फ पीटर्स का मत है कि –  “जिहाद के सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण कार्य तो यह है कि यह मुसलमाओं को गैर-मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने के लिए लामबंद कराना और प्रेरित करना है क्योंकि इसे एक धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति समझा जाता है | इस प्रोत्साहन के लिए यह प्रलोभन बलपूर्वक दिया जाता है कि जो कोई भी युद्ध के मैदान में मारा जाता है, वह शहीद कहलाता है, वह सीधा जन्नत में जाएगा | (गैरमुसलिमों के विरुद्ध होने वाली लड़ाइयों के अवसर पर कुरान की आयातों व हदीसों से सराबोर धार्मिक पुस्तकें घुमाई व सुनाई जाती हैं जिनमें जिहाद में लड़ने व मिलने वाले पुण्य फलों का विस्तार से वर्णन होता है और जिहाद में मारे गए लोगों को मरणोपरांत जन्नत में, उनकी प्रतीक्षा कर रहे, सुखों का वर्णन होता है |)”                   (जिहाद इन क्लासिकल एण्ड मॉडर्न इस्लाम, पृ. 5)

 8. इस्लामी जिहाद के विषय में, प्रसिद्ध आधुनिक साहित्यकार डॉ. एस. के. लाल अपनी पुस्तक थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया (पृ. 5) में इस प्रकार लिखते हैं :

“मुस्लिम सुल्तानों ने अपने इस्लामी कानून (शरियत) के अनुसारऔर हिन्दू राजाओं ने अपने धर्मशास्त्रानुसार, भारत मेन राज्य किया || मगर इन दोनों की शासन प्रणाली और युद्ध के नियम एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न थे | कुरान अन्य धर्मों के अस्तित्व, उनके धार्मिक रीति-रिवाजों और उनकी निरंतरता को बने रहने देने की अनुमति नहीं देता है | कुरान की कुल 6326 आयतों में से लगभग 3900 आयतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से अल्लाह और उसके रसूल में ईमान न रखने वालों या काफिरों, मुशरिकों, मुनकिरों और मुनाफिकों से संबन्धित हैं |ये 3900 आयतें मुख्य रूप से दो प्रकार की हैं | एक श्रेणी की आयतें मुसलमानों से संबंधित हैं जो अपना ईमान अल्लाह में लाने के कारण इस जीवन में और मरने के बाद भी पुरस्कृत किए जाएंगे | दूसरी प्रकार के वे हैं जो कि न केवल इस जीवन में सताए जाएंगे बल्कि मरने के बाद ‘जहन्नम’ की आग में डाले जाएंगे |”

कुरान मानव जाति  के लिए भाई-चारे के विधान की अपेक्षा युद्ध सम्बन्धी विधि-विधान का गृन्थ प्रतीत होता है | कुरान का अन्य धर्म वालों के विरुद्ध जिहाद या इस्थाई युद्ध का आदेश, पहले भी था और आज भी है | इस्लाम अन्य धर्म वालों के विरुद्ध जिहाद या लगातार युद्ध, करने तथा उन्हें कैद करने, बांधने, कत्ल करने और उन्हें जहन्नम की आग में जलाने की शिराफिस करता है | इससे इस्लाम एक सर्व सत्तात्मक और आतंकवादी धार्मिक पन्थ हो जाता है जैसा कि वह अपने धर्म से हे रहा आया है |

इस संबंध में भारत में पिछले ग्यारह सौ वर्षों तक (700-1800 ई.) इस्लामी राज्य कल में चले आई इस्लामी जिहाद की व्यावहारिक झांकी जय दीप सेन द्वारा लिखित एवं हिन्दू राइटर्स फोरम से प्रकाशित पुस्तक ‘भारत में जिहाद’ में देखी जा सकती है |

उपरोक्त उद्धरणों से सुस्पष्ट है कि गैर मुसलमानों के प्रति इस्लामी जिहाद का असली मतलब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में मुसलमान बहुसंख्यक हैं या अल्पसंख्यक | जहां मुसलमान बहुमत में होते हैं तो वहाँ जिहाद का मतलब मुसलमानों के व्यक्तिगत व सामाजिक जेवण में कुरान, हदीसों एवं पैगंबर मुहम्मद के आदर्शों के अनुकूल उन्नति के प्रयास करना तथा आपसी प्रेम व भाई-चारे को मजबूत कर मुस्लिम शक्ति को बढ़ावा देना होता है | वहाँ सच्ची कुरानी इस्लामी राज्य को लाना होता है | ऐसे देशों में सच्चे इस्लाम को स्थापित करने के नाम पर शिया-सुन्नी-अहमदियाओं के पारस्परिक संघर्ष को भी जिहाद कहा जाता है |

इसके विपरीत यदि उस देश में मुसलमान अल्पमत में होते है जैसा कि भारत में, तो जिहाद का मतलब यह होता है कि –

(1)    वहाँ मुसलमान अपने व्यवहार वाणी लेखन प्रवचन आदि से इस्लाम का प्रचार-प्रसार करें |

(2)    विभिन्न धार्मिक सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक संगठनों के द्वारा मुसलमानों के हितों की रक्षा करें |

(3)    मुसलमानों के व्यक्तिगत क़ानूनों को सरकारी तंत्र से मुक्त रखने का प्रयास करें |

(4)    सभी संभव उपायों के द्वारा गैर-मुसलमानों को मुसलमान बनाने की कोशिश करें |

(5)    वहाँ इस्लामी राज्य स्थापित करने का हर संभव प्रयास एवं संघर्ष जारी रखें जब तक कि वहाँ इस्लामी राज्य स्थापित न हो जाय |

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुसलमान युवकों को, अल्लाह के नाम पर, गैर-मुसलमानों से जिहाद करने के लिए यह कहकर प्रोत्साहित किया जाता है कि यदि जिहादी संघर्ष में वे सफल हो गए और आगे चलकर यहाँ अल्लाह का राज्य स्थापित हो गया तो वे सभी सांसरिक सुख भोगेंगे और मर गए तो सीधे जन्नत को जाएंगे जहाँ वे सभी प्रकार के ऐशों-आराम सदैव करते रहेंगे | दूसरी तरफ गैर-मुसलमानों को इस्लाम न स्वीकारने पर मरने के बाद जहन्नम की यतनाओं का भय दिखाया जाता है | मगर आधुनिक विज्ञान भी, सृष्टि भर में कही भी स्वर्ग-नरक, जन्नत-जहन्नम आदि की स्थिति का पता नहीं लगा पाया है | फिर भी मुल्ला-मौलवी इस काल्पनिक जन्नत का प्रलोभन देकर युवकों को जिहाद के लिए उकसाते रहते हैं | नगर हदीसों के अनुसार जिहादी को जन्नत कियामत के बाद ही मिलेगी |

भारत में हिंदुओं क बहुमत होने के कारण पिछले तेरह सौ वर्षों से इस्लामी खूनी जिहाद लगातार चला आ रहा है | यहाँ हिंदुओं, बौद्धों पर बिना कोई कारण लगातार अनेक भीषण हमले किए गए | आज भी भारत विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान और बांग्लादेश दो इस्लामी राज्य बनाने के बाद भी बचे खुचे भारत को इस्लामी राज्य बनाने के लिए जबर्दस्त बहुआयामी जिहाद जारी है | मुस्लिम बहुल कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों को मुसलमान खुल्लम-खुल्ला जिहाद कहते हैं | भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के अनेक इस्लामी संगठन भारत के विभिन्न भागों में आतंकवादी गतिविधियों को भी जिहाद कहते हैं | यहाँ तक की बांग्लादेशी मुसलमानों का भारत के इस्लामीकरण के उद्देश्य यहाँ पिछले पचास वर्षों से घुसपैठ करके बसना भी जिहाद का एक अंग माना जाता है |

अतः संक्षेप मेँ जिहाद मुसलमानों के व्यक्तिगत एवं सामाजिक मामलों मेँ एक आंतरिक संघर्ष व आपसी भाई-चारे का प्रतीक हो सकता है मगर गैर-मुसलमानों के संदर्भ मेँ जिहाद का स्पष्ट अर्थ गैर-मुसलमानों का धर्मांतरण एवं उनसे संघर्ष करना तथा अन्य सभी संभव उपायों द्वारा उनके देश को इस्लामी राज्य बनाने का प्रयास करना है |

इस्लाम एक धर्म प्रेरित राजनैतिक व्यवस्था है जिसका भारत ही नहीं, विश्वभर मेँ कही भी स्थानीय राष्ट्रवाद और सेक्युलरिज़्म मेँ बिलकुल विश्वास नहीं है | इसका उद्देश्य उस देश की प्राचीन संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं को मिटाकर इस्लाम धर्म, अरबी संस्कृति और अरबी साम्राज्य स्थापित करना है | अतः सभी राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्ष, लोक कल्याणकारी एवं मानवतावादी शक्तियों को समस्त पारस्परिक मतभेद भुलाकर एकजुट होकर इस जिहादी आतंकवाद का हर स्तर पर विरोध करना चाहिए | व्यावहारिक स्तर पर ‘जैसे को तैसा’ की नीति अपनाना श्रेयस्कर होगा |

हमें आशा है की पाठकों को मुसलमानों की गैर-मुस्लिमों के प्रति जिहाद की सच्ची तस्वीर साफ हो गई होगी |

 

 

 “कुछ चापलूस कहते है की इस्लाम आरंभ मेँ उदार था और असहिष्णुता बाद की उपज है | किन्तु सत्य ऐसा नहीं है | इस्लाम प्रारम्भ मेँ भी इतना ही असहिष्णु था जितना अब है | असहिष्णुता इस्लाम पन्थ का एक प्रमुख अंग है | यह युद्ध की एक घोषणा है | गैर-मुसलमानों और उनके देवों के प्रति युद्ध संगीत है | ऐतिहासिक दृष्टि से यह असहिष्णुता प्रारम्भ से ही है और अब तक चालू है | एक पवित्र मुसलमान से दिन मेँ पाँचबार अपने देवता अल्लाह के एकमात्र सच और महान होने की तथा दूसरों के देवों के झूठा होने की घोषणा और दावा किया जाना अपेक्षित है |”

— मार्गेलियोथ
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“इस्लामी पन्थ से तीन महत्वपूर्ण और सारगर्भित दोष प्रत्येक युग और प्रत्येक देश मेँ प्रवाहित होते हैं | और अनिवार्यतः प्रवाहित होते रहेंगे जब तक कुरान इस्लाम के विश्वास का मानक मार्ग दर्शक रहता है | प्रथम इसमें बहुविवाह, तलाक और दास प्रथा सार्वजनिक नैतिकता के मूल पर आघात करते हैं ; पारवारिक जीवन को विषाक्त करते हैं और मानव समाज को अस्त-व्यस्त करते हैं जबकि बुर्का (पर्दा) महिलाओं को विश्व मेँ अपने न्यायोचित स्थान और प्रभाव से वंचित करता है | दूसरे इसमें विचरों की स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत विवेक को पूरी तरह कुचल और उन्मूलित कर दिया जाता है | इस पन्थ मेँ सहिष्णुता अज्ञात है और स्वतंत्र तथा उदार संतों की संभावनाओं को प्रतिबंधित कर दिया जाता है | तीसरे इसने ईसाइयत की स्वीकृति के मार्ग मेँ बधाएँ खड़ी कर दी हैं |”

— विलियम मूर‘लाइफ ऑफ मोहमेट’ पृ. 520
 

 

 

 

 

 
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