Law of Conversion

                                                                                             मतांतरण
                                                                           चुनौतियाँ एवं विधिक समाधान

लेखन एवं सम्पादन:

रामप्रसाद
(उत्तर एवं उत्तरपश्चिम क्षेत्र)
धर्म जागरण समन्वय प्रमुख
केंद्र : जयपुर

रामस्वरूप अग्रवाल
प्राचार्य, विधि महाविद्यालय, कोटा(राजस्थान)

 प्रस्तुति:
संस्कृति समन्वय
(जनकल्याण प्रतिष्ठान का उपक्रम )
पाथेय भवन, बी-19, न्यू कॉलोनी , जयपुर(राजस्थान)
फोन नंबर-0141-4038590

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                                                                                                संदेश 

मुझे यह जानकार प्रसन्नता हुई कि ‘संस्कृति समन्वय’ ‘मतांतरण :चुनौतियाँ एवं विधिक समाधान’ विषय पर पुस्तिका का प्रकाशन करने जा रहा है| भारत जैसे बहुधर्मीय समाज में मतांतरण का विषय समाज में सदभाव के माहौल को बरकरार रखने की  बड़ी चुनौती है| भारतीय संविधान ने जहा हमें अपनी उपासना पध्दति और अपने धर्म के अनुसरण का अधिकार दिया है वही प्रत्येक नागरिक का दायित्व भी है कि वह धर्मांतरण जैसे कार्य  में लिप्त न हो| भारत जैसे देश में  जहां गरीबी व अशिक्षा बड़ी तादात में है वहाँ पर प्रलोभनवश या अज्ञानतावश मतांतरण करना आसान होता है | इस तरह से कराये गए मतांतरणों से अन्य वर्गों में प्रतिकृया होती है तथा सदभाव का माहौल कटुता में बदल जाता है |जिससे राष्ट्र के विभिन्न वर्गों में स्थापित किए जाने वाले सदभाव को चोट पाहुचती है | इस संदर्भ में संस्कृति समन्वय द्वारा प्रकाशित की  जा रही पुस्तिका एक अच्छा प्रयास  है जिसके माध्यम से विभिन्न राज्यों द्वारा पारित किए गए क़ानूनों की  जानकारी नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएगी वही पर प्रलोभन देकर या कमजोर व अशिक्षित वर्गो में किए जा रहे मतांतरण के विरूद्ध  सामाजिक चेतना भी उत्पन्न की जाएगी |
सुभकमनाओ सहित |
                                                                                                                                                                                जसबीर सिंह

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                                                                                            अनुक्रमणिका

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*  प्राक्कथन
*  प्रस्तावना

                                                                                       मतांतरण : एक चुनौती

1.  मतांतरण : जनसंख्या असंतुलन का बढ़ता खतरा

                                                                                           विधिक समाधान

2.      संविधान नहीं देता मतांतरण का अधिकार
3.      संविधान सभा एवं मतांतरण
4.      लड़कियों को भागने वालों पर  कानूनी शिकंजा
5.      गैर कानूनी है अवैध धार्मिक निर्माण
6.      चंगाई सभाओं द्वारा मतांतरण : कानूनी रोक
7.      घृणा फैलाने पर कानूनी कार्यवाही
8.      विदेशी नागरिक का अवैध निवास
9 .     एफ. आई. आर. दर्ज कराने का तरीका
10.    पर्यटक वीजाधारियों की मिशनरी गतिविधियों पर प्रतिबंध
11.    सूचना का अधिकार : मतांतरण रोकने में सहायक
12.    धार्मिक स्थलों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण – कैसे हो नियंत्रण?

                                                                                    तथ्य एवं आलेख

13.    रंगनाथ मिश्र आयोग रिपोर्ट : मतांतरण को बढ़ावा
14.    सच्चर समिति की  रिपोर्ट : अलगाववाद की  दिशा में आत्मघाती कदम
15.    धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम : समस्त राज्यों के लिए अपेक्षित

                                                                                          परिशिष्ट

(क)     हिमाचल प्रदेश धर्म की  स्वतन्त्रता विधेयक ,2006
(ख)     मतांतरण : क्या कहते है महापुरूष

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                                                                                        प्राक्कथन

मतांतरण समस्या केवल  किसी एक विशिष्ट जाति, जनजाति की नहीं है | यह समस्या पूरे भारतीय समाज की  है | इस समस्या को सुलझाने के लिए सम्पूर्ण देश को सक्रिय बनाना आवश्यक है| इसलिए इसके समाधान के लिए इसे केवल एक विशिष्ट जाति या जनजाति की समस्या न मानते हुए राष्ट्र की समस्या  मानकर इसका मुक़ाबला करने का मार्ग प्रशस्त करने की आवश्यकता है | इस कार्य में प्रत्येक की भूमिका है| जनसमान्य की भूमिका है | विशिष्ट अध्ययन करने वालों की भी भूमिका है |शासन का भी इसमें  महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है |शासन जब ठीक भूमिका का निर्वाह कर इस प्रकार की गतिविधियों को रोकने का अपने तरह से प्रयास करेगा तो बाकी सभी प्रयासों को अच्छा बल मिलेगा | यह प्रयास  शासन पर आश्रित नही रहेगा ,लेकिन शासन का सहयोग इसके लिए उपयोगी रहेगा|
अपने समाज की मूल धारा , मूल प्रवृत्ति और मूल शक्ति को बढ़ाने की दृष्टि से धर्म जागरण विभाग कम कर रहा है | इसी को आधार बनाकर यदि पूर्ण समाज इसके पीछे खड़ा रहेगा तो मुझे लगता है कि यह लड़ाई लड़ने में आसनी हो सकती है|
अपने देश में बाहर से आए ईसाइयत तथा इस्लाम के लोगो ने सब प्रकार का अत्याचार करते हुए अपने पंथ का प्रसार किया| जिसके दौरान यहाँ के मूल समाज के अनेक लोगों को मतांतरित भी किया था | इन दोनों क्रूर शक्तियों द्वारा किए गए भयानक अत्याचारो के बबजूद इस देश में भारत का मूल समाज लगभग 85 प्रतिशत बरकरार रहा है| यह तथ्य अपने सभी प्रयत्नो का सम्बल है, क्योकि इस प्रकार के अत्याचारों  में अनेक राष्ट्र नष्ट हो गए लेकिन इतना सब प्रकार का आक्रमण होने के बाद भी आज अपने देश में भारत की मूल संस्कृति हिम्मत के साथ खड़ी है | इसकी जो पृष्ठभूमि है, इसका जो आधार है, वो यह सामान्य हिंदू जन के मन में अपने इस धर्म के प्रति , अपनी परम्पराओं के प्रति, अपने महापुरूषों के प्रति आस्था निर्माण करने का अनेक संत -महंतों ने प्रयास किया है |अनेक महापुरूषों ने अपने समाज को बरकरार रखने के लिए जो बलिदान दिये है, इसका यह परिणाम है|
मतांतरण की समस्या से मुक़ाबला करने के लिए जो कानूनी प्रावधान सहायक हो सकते है , उसके संबंध में स्पष्टता से किन्तु संक्षिप्त रूप में चर्चा इस पुस्तिका में की गई है| प्रत्यक्ष कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को इस जानकारी से बल मिलेगा| वे हिम्मत के साथ कार्य करेंगे | इसी को ध्यान में रखकर सब सोचें , सब अधिक सक्रिय बनें और अपने -अपने क्षेत्र में इस समस्या को हल करने के लिए आगे आयें| अपने साथ अधिवक्ता बंधुओं को लेकर , इस कार्य में जितनी कठिनाई आएगी , उसको निरस्त करने के लिए आप अग्रसर हों , यही मेरी आपसे प्रार्थना है|

 मुकुंदराव पणशीकर

अखिल भारतीय प्रमुख
धर्म जागरण समन्वय विभाग
केंद्र -मुंबई

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                                                                                                प्रस्तावना

भारत में मतांतरण की समस्या ने विकराल  रूप धरण कर लिया है | इस समस्या के कई पहलू है| हजारों की संख्या में ईसाई मिशनरी संस्थाएं मतांतरण के कार्य में लगी हुई हैं | इस कार्य के लिए उन्हें यूरोप, अमेरिका से अपार धन प्राप्त हो रहा है| विदेशी नागरिक ट्यूरिस्ट वीजा पर भारत आकार मतांतरण कार्य में संलग्न हो जाते हैं | प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में हिन्दू लड़कियों का कतिपय दिग्भ्रमित मुसलमान युवकों द्वारा बहला -फुसला कर भगाई जा रहीं हैं | देश में जगह -जगह अवैध मजारों का निर्माण हो रहा है | अवैध रूप से भारत आकर रह रहे बंगलादेशी घुसपैठियों की संख्या तीन करोड़ से भी ज्यादा बताई जा रही है| इस सम्पूर्ण परिदृश्य में यह विचार करना उचित होगा कि मतांतरण की समस्या और इसके विविध पक्षों के संबंध में क्या भारत का कानून कोई भूमिका निभा सकता है |
बलपूर्वक ,कपट से या प्रलोभन देकर मतांतरण कराने पर रोक लगाने तथा इस कृत्य को दंडनीय घोषित करने संबंधी कानून देश के कुछ राज्यों ने बनाए है |सम्पूर्ण देश में लागू ‘भारतीय दंड संहिता ‘ में भी अनेक प्रावधान है जिनका उपयोग मतांतरण को रोकने तथा इस कार्य में संलग्न लोगों को दंडित करने में किया जा सकता है | ‘विदेशी- अधिनियम’,'धार्मिक भवन व स्थान अधिनियम ‘ जैसे कानून भी मतांतरन  के किसी न किसी पक्ष को प्रभावित करते है | सूचना के अधिकार अधिनियम ,2005 का उपयोग मतांतरण से जुड़े अनेक पक्षों की  जानकारी प्राप्त करने में  किया जाता है | भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार मे मतांतरण का अधिकार सम्मिलित नही है | इस प्रकार के सभी कानूनी प्रावधानों का संकलन  करने का प्रयास इस पुस्तिका में किया गया है| सच्चर समिति तथा रंगनाथ मिश्र आयोग की  रिपोर्ट इस संदर्भ में प्रासंगिक होने के कारण उसके बारे में भी जानकारी दी गई है |पुस्तिका के प्रारम्भिक प्रष्ठों में मतांतरण समस्या और उसके समाधान पर एक आलेख दिया जा रहा है|
आशा है , मतांतरण को रोकने में लगे जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रयत्नो को सफलीभूत बनाने में यह पुस्तिका सहायक सिद्ध  होगी| पुस्तिका हेतु सामाग्री संकलन में अनेक बंधुओं से प्राप्त सहयोग के लिए हम उनके आभारी है पुस्तिका के भावी संस्कारण में क्या परिवर्तन या परिबर्धन किया जाय ,इस हेतु सुझावों की  प्रतीक्षा रहेगी|
                                                                                                                                                              -लेखक द्वय

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                                                                                     मतांतरण : एक चुनौती

अध्याय -1 

मतांतरण : जनसंख्या असंतुलन का बढ़ता खतरा

भारत में मतांतरण एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से चल रहा है | प्रथम मुस्लिम आक्रमणकारी महमूद बिन कासिम 712 ईस्वी सन में भारत आया और प्रथम इसाई मिशनरी फ्रांसिस ज़ेवियर सन 1548 ईसवी में गोवा में आया था |
मुस्लिम और ईसाई मतों के इन दोनों प्रतिनिधियों ने नृसंग अत्याचारों द्वारा अत्यंत क्रूरता पूर्वक , ज़ोर जबरजस्ती  से , छल कपट और लोभ -लालच का प्रयोग करके हिन्दुओं में मतांतरण प्रारम्भ किया – जो अभी तक अबाध गति से चल रहा है | परिणामस्वरूप गाँव के गाँव एवं अनेकानेक बिरदरियाँ मतांतरित हो गई | यह एक एसा सांस्कृतिक आक्रमण था जिससे अपने देश के मूल सामाजिक हिन्दू जीवन को भारी विनाश का सामना करना पड़ा |जिसके कारण आगे चलकर भारत का इतिहास और भूगोल बदल गया |
मुस्लिम आक्रमणकारियों की  मनोवृत्ति जेहादी थी | उन्होने एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार लेकर कहा कि इस्लाम कबूल करो , नहीं तो मरने के लेए तैयार हो जाओ| इस प्रकार अमानुषिक तरीके का सहारा  लेकर मतांतरण किया गया | इसी प्रकार गोवा से पुर्तगाली शासन में ईसाई मिशनरी का फ्रांसिस ज़ेवियर के नेत्रत्व में छल-छह्म और अत्याचारों के बल पर ईसाईकरण जारी रहा | ज़ेवियर ने तो उस समय सात लाख लोगों को ईसाई बनाया | पुर्तगाली वाइसराय एलबुकर्क ने तो अपनी प्रधान नीति मतांतरण को ही बनाया | उसने भारत में पुर्तगीज उपनिवेश को स्थायित्व प्रदान करने के लिए बड़ी संख्या में हिन्दू युवतियों को ईसाई बनाया | किन्तु अब परिस्थितियाँ बदली हुई हैं | ज़ोर जुर्म ओर ताकत के बल पर मतांतरण संभव नहीं रहा |अतः इन दोनों विदेशी पंथों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है |ईसाई पादरियों ने सेवा का चोंगा ओढ़ लिया है| वे अब लोभ लालच के द्वारा अशिक्षित समाज के अशिक्षित  वर्गों का मतांतरण करने में लगे हैं| इन विवशताओ का लाभ लेकर उनमें ईसाईकरन की  प्रक्रिया ज़ोर शोर से चल रही है |

दारुल इस्लाम का सपना 

कतिपय दिग्भ्रमित मुस्लिम नेत्रत्व ने जनसंख्या वृद्धि  को ही हथियार बना लिया है | सारे संसार को दारुल इस्लाम बनाने का सपना है |अतः वे
(1)   ज्यादा बच्चे पैदा कर
(2)   बांग्लादेश से हो रही सुनियोजित घुसपैठ
द्वारा अपनी आबादी को बढ़ाने में लगे हुए हैं | सरकारी आंकड़ों से लगभग 3 करोड़ बंगलादेशी मुसलमान भारत में आ गए हें और खुली सीमा के कारण आते ही जा रहे है| इसी प्रकार कुछ दिग्भ्रमित मुसलमानों द्वारा हिन्दू लड़कियों को भगा कर ले जाने का उपक्रम भी चल रहा है| प्रतिवर्ष लगभग दो लाख लड़कियां मुसलमानों के साथ भाग जातीं हैं|

अतः यह चिंतनीय विषय है कि संख्या बल में  अपने को सर्वोपरि और दूसरों को मिटा देने की मानसिकता आज पूरे देश में  ज़ोर-शोर से कम कर रही है | समस्त भारतीयों को जनसंख्या बृद्धि के इन कुत्सित इरादों को समझना होगा | उनकी योजना के अनुसार ही कुछ मुस्लिम /ईसाई लोग देश के कुछ हिस्सों में  हिंदुओं को अल्प संख्या में  बदलने में  सफल हो गए हें| आगे कुछ वर्षों में  एसे क्षेत्रों का विस्तार तीव्रता से होता नजर आ रहा है | हमें यह बात समझनी होगी की मतांतरण एवं जनसंख्या बृद्धि के कारण ही पाकिस्तान और बांग्लादेश का निर्माण संभव हो सका | किसी ने ठीक ही कहा  है कि  ”धार्मिक आबादी का विषय देश की तकदीर बादल देता है ,भूगोल बादल देता है ,अर्थव्यवस्था को चौपट कर देता है , सुरक्षा की मांग बढ़ा देता है |”अतः इस इस देश के हिंदुओं को नींद से जागने -जगाने की आवश्यकता है | अगर इसके महत्व को हमने समझा नही तो यह न केवल सामाजिक अपराध होगा  बल्कि घोर देश द्रोह भी होगा |इसलिए  अनुभवी विश्लेषकों  की सलाह  को समझना होगा कि ” आने वाले खतरों से समाज जब अनजान रहने का नाटक करता है तो भविष्य की पीढ़ियों को हानि उठानी पड़ती है |”

समझने का विषय यह है कि यदि प्रभावी उपाय नही किए गए तो भारत के मूल लोग (विशेषकर हिन्दू )अपनी ही भूमि पर अधिकार खो बैठेंगे |यदि जनसंख्या बृद्धि इसी तरह असंतुलित रही तो भारत में  हिन्दू ही अल्पसंख्यक की  श्रेणी में आ जाएगा | यह उदाहरण निम्न सारणी द्वारा स्पस्ट  है -

पूर्वोत्तर राज्यों  की  कुल आबादी  में ईसाई आबादी का प्रतिशत -

जनगणना वर्ष असम अरूणाचल नागालैंड मणिपुर मिजोरम त्रिपुरा मेघालय
1991
2001
3.3
23.70
10.29
18.70
87.47
90.00
34.12
34.00
85.73
87.00
1.6
93.20
64.58
70.3

उपरोक्त तथ्य देखने से ध्यान में आता है कि उत्तर पूर्वाञ्चल  में कुछ ईसाई राज्य हो चुके है और कुछ होने की तैयारी में हैं | इन सभी राज्यों में ईसाईयों द्वारा पोषित पल्लवित उग्रवादी संगठनों का आतंक एवं मतांतरण का कार्य ज़ोर शोर से चल रहा है | अपने देश की  आजादी से अब तक इन सारी देश विभाजनकारी शक्तियों को ताकत प्रदान करने में अपने कर्णधारों की भूमिका अहम रही है | देश के नेत्रत्व को समझना होगा कि ईसाईयों द्वारा समाज सेवा के नाम पर आस्था परिवर्तन का प्रयास कितना उथला और कृतिम है|  इसे रोकना चाहिए | यदि रोका न गया तो धार्मिक आधार पर जनसंख्या में असंतुलन पैदा हो सकता है  परिणाम स्वरूप वहाँ अराजकता की  स्थिति पैदा हो सकती है|

धार्मिक आधार पर जनसंख्या असंतुलन देश की मूल संस्कृति से दूर ले जाने वाला एवं आतंक को बढ़ावा देने वाला हो सकता है | आतंक को गंभीर चुनौती मानने वाले देश के नेत्रत्व को अब इसके मूल तत्वों मे से एक ‘मतांतरण ‘को रोकने हेतु सकारात्मक एवं  त्वरित कार्यवाही पर ध्यान देना होगा |

मतांतरण से उत्पन्न समस्याएँ -

जहां मतांतरण होता है वहाँ मतांतरित लोगों की  सामाजिक स्थिति में अंतर आ जाता है  प्रारम्भ में स्थानीय समाज उन्हें घृणा की  दृष्टि  से देखता है  इनके साथ उठाना -बैठना भी पसंद नहीं करता | परस्पर तनाव और सदा संघर्ष की स्थिति निर्माण होती है |

- मतांतरित व्यक्ति प्रारम्भ में नए मजहब की मान्यताएँ -परम्पराएँ आदि को उत्साहपूर्वक अपनाता है | पहले की अपनी हिन्दू अस्थाओं का मखौल भी उड़ता है- अपमानित भी करता है | अतः अशांति का सृजन होता है|

-मतांतरण से रोटी -बेटी व्यवहार खत्म हो जाता है | ईर्ष्या -द्वेष में बृद्धि होती है जिसके परिणाम हानिकारक होते है|

-मतांतरित व्यक्ति नए मजहबनुसार रहन -सहन, आचार-विचार स्वीकारता है| उसके सोचने में अंतर आ जाता है लंबे समय तक उसी वातावरण में रहने के कारण उसी में रम जाता है | वह अराष्ट्रीय हो जाता है | राष्ट्र की अवमानना का भाव आ जाता है| स्वामी विवेकानंद कहा करते थे -मतांतरण रष्ट्रांतरण है |

युग का आह्वान  -

इस भयाभय समस्या का समाधान जागरूक हिन्दू समाज ही करेगा | हिन्दू समाज को अपना मन बड़ा करके सोचना होगा | हमारे सहोदर भाई किसी जमाने में किसी असाधारण परिस्थितिवश हुमसे बिछड़ने को विवश हो गए -ज़बरदस्ती हुमसे छीन लिए गए  हम चाहते हुए भी उनकी रक्षा न कर सके अब समय आ गया है ,उन्हें हमें गले लगाना चाहिए | उनके लिए घर वापिसी के द्वार खोल देने चाहिए | उन्हे प्रेम पूर्वक अपनाइए और सममानपूर्वक उन्हे वही स्थान दीजिये जो उनका पूर्व काल में था |

समाधान की दिशा में विनम्र अनुरोध -

किसी जमाने में किन्ही कारण वश मतांतरित होने के लिए जिन्हें विवश किया गया -उन मुसलमान और ईसाई बने भाइयों से   विनम्र अनुरोध करता हु कि वे अपने पूर्वजों के रक्त सम्बन्धों को न भूलें | हिन्दू बंधुओं के आह्वान को स्वीकार कर अपने घर में निःसंकोच प्रवेश करें | किसी के भी बहकावे मे न आवें | अपनी भारत माता  के आँगन में मिलकर आनंद मनावे और अतीत की दुःखद घटनाओं को भुला दें | उदार मन से गर्व के साथ कहें “हम तुम्हारे ही थे , तुम्हारे ही रक्त हैं , हमारे पुरखे एक हैं और हम भी भारत माता  की संतान हैं |”

||भारत माता कि जय ||

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                                                                                           विधिक समाधान 

अध्याय -2 

संविधान नही देता मतांतरण का अधिकार 

भारत के संविधान के अनुच्छेद  25 (1)  में धर्म स्वातंत्र्य का अधिकार (right to freedom of religion ) दिया हुआ है | इस अधिकार के मुख्य तत्व निम्नांकित है -

1॰  इस अधिकार के पहले भाग के अनुसार सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतन्त्रता (Right to freedom of conscience ) का समान हक है |

2.  इस अधिकार के दूसरे भाग के अनुसार सभी व्यक्तियों को धर्म के अबाध रूप से मानने ,आचरण करने और प्रचार करने (to profess ,practice and propagate ) का समान हक है|

उपरोक्त अधिकार अनियंत्रित नही हैं| राज्य निम्नांकित चार आधारों पर इसको नियंत्रित  कर सकता है -

1.  लोक व्यवस्था

2.  सदाचार

3.  स्वास्थ्य

4.  संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार

संविधान के इस अनुच्छेद का विवादित भाग है -”धर्म का प्रचार करने का अधिकार (right to propagate )” ईसाई मिसनरीज़ का मानना है कि ‘धर्म का प्रचार करने के अधिकार में मतांतरण का अधिकार भी शामिल है | ‘उनके अनुसार प्रत्येक ईसाई का धार्मिक कर्तव्य है कि ईसाई मजहब का विस्तार करने के उद्देश्य से ईसाई मजहब का प्रचार करे | ईसाई मिसनरीज़ के अनुसार मतांतरण करना यानि गैर इसाइयों को ईसाई बनाना ईसाई मजहब का आवश्यक भाग है | निष्कर्ष रूप में यह कि ईसाई मिसनरीज़ के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 25 (1)  के अंतर्गत उन्हें मतांतरण करने का अधिकार प्राप्त है |

उपरोक्त विवादित मुद्दे पर ” रेवरेंड स्टेनिस्लाम बनाम मध्य प्रदेश राज्य ‘(AIR 1977  SC ) नामक मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय को विचार करने का मौका प्राप्त हुआ | सन 1977 में दिये गए अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने ईसाई मिशनरीज़ के तर्को को मनाने से इंकार करते  हुए स्पष्ट रूप से निर्णय दिया कि ‘अपने मजहब के प्रचार करने के अधिकार में दूसरे व्यक्ति को अपने धर्म में मतांतरित करने का अधिकार शामिल नही है | सर्वोच्च न्यायालया के अनुसार ‘प्रचार करने के अधिकार ‘ से तात्पर्य है कि ‘ अपने मजहब के मुख्य  सिद्धांतों का प्रकटीकरण करते हुए अपने धर्म का प्रसार करना | ‘इस मामले में निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अजीत रे ने कहा कि अनुच्छेद  25 (1 )  ’अन्तःकरण की स्वतन्त्रता ‘ प्रत्येक नागरिक को प्रदान करता है , न की किसी विशिष्ट धर्म के अनुयायियों को | इसका तात्पर्य यह हुआ कि अपने धर्म में किसी को मतांतरित करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है | क्योकि क्योंकि एक व्यक्ति अभिप्राय सहित दूसरे व्यक्ति का अपने धर्म में मतांतरण करता है तो इससे देश के सभी नागरिकों को समान रूप से प्रदत्त ‘अन्तःकरण  के अधिकार ‘  का हनन होगा | यदि कोई व्यक्ति अपने धार्मिक विचारों को दूसरे तक संप्रेषित करने के बजाय उसे धर्म परिवर्तन करने पर विवश करता है तो वह उसके अन्तःकारण की स्वतन्त्रता पर सीधा आघात करता है , जो संविधान द्वारा वर्जित है | न्यायालय ने यह भी कहा कि  जिस बात की किसी एक व्यक्ति के लिए स्वतन्त्रता है , उसकी उतने ही परिमाण में किसी दूसरे व्यक्ति को भी स्वतन्त्रता है | इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति का अपने धर्म में मतांतरण कराने का मौलिक अधिकार जैसी कोई बात नहीं है|

यहाँ हमें स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि सविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय सम्पूर्ण देश पर बंधनकारी होता है सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त वर्णित निर्णय देते हुए मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा राज्यों द्वारा निर्मित ‘धर्म स्वतंत्र्य ‘ अधिनियमो को वैध एवं संविधान के अनुसार उचित घोषित किया इन अधिनियमों के द्वारा बलपूर्वक धोखे से प्रलोभन तथा लालच देकर किए जाने वाले मतांतरण पर रोक लगाते हुए एसे कृत्य को दंडनीय बना दिया था | इस प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल मतांतरण पर रोक लगाने वाले क़ानूनों को उचित ठहराया वरन यह भी स्पष्ट रूप से घोषित किया कि संविधान द्वारा दिये गए धर्म स्वातंत्र्य के अधिकार में’मतांतरण करने का अधिकार ‘ सम्मिलित नहीं है

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 अध्याय – 3 

 संविधान सभा एवं मतांतरण -

भारत के संविधान में  किन मौलिक अधिकारों को शामिल किया जाय ,इस पर सुझाव देने के लिए संविधान निर्मात्री सभा ने एक सलाह कार समिति का गठन किया था | उक्त सलाहकार समिति ने मूल अधिकारो का प्रारूप बनाने हेतु ‘मूल अधिकारों की उपसमिति ‘ नियुक्त की |

इस उपसमिति द्वारा प्रस्तुत प्रारूप पर अल्पसंख्यकों का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए एक अन्य उपसमिति ‘अल्पसंख्यक उपसमिति ‘ का भी गठन किया |

‘मूल अधिकारों की उपसमिति’ ने सलाहकार समिति को प्रस्तुत  अपनी प्रारूप -रिपोर्ट  में विभिन्न मूल अधिकारों के साथ ही दबाब या अनुचित प्रभाव से किए जाने वाले मतांतरण को अपराध घोषित करने का प्रावधान भी सम्मिलित किया | इस प्रारूप -रिपोर्ट का अनुच्छेद 23 निम्नानुसार था |

“Conversion from one religion to another brought about by coercion or undue influence shall not be recognized by law and exercise of such coercion or undue influence shall be an offence” (framing of India’s constitution by b. Shiva Rao, page 140).

मूल अधिकारों की उप -समिति द्वारा प्रस्तावित रिपोर्ट पर ‘अल्पसंख्यक मामलों की उप -समिति ने ‘ विचार कर उपरोक्त प्रावधान के स्थान पर निम्नांकित

प्रावधान मूल अधिकारों के अध्याय में सम्मिलित करने का सुझाव दिया –

“No conversion shall be recognize unless the change of faith is attested by a magistrate after the enquiry”. (framing of India’s constitution by ‘B. Shiva Rao’ page 209)

स्पष्ट है कि मतांतरन की समस्या से संविधान निर्माता भी भलीभाँति परिचित ही नहीं, चिंतित भी थे, अतः उन्होने दबाव या अनुचित प्रभाव से किए गए मतांतरण को न केवल कानून में अमान्य ठहरने का प्रस्ताव किया, वरन मतांतरण हेतु दबाव या अनुचित प्रभाव डालने को अपराध भी घोषित करने का सुझाव दिया | अल्पसंख्यक मामलों की उपसमिति  ने भी इस प्रावधान को पूरी तरह हटाने की हिम्मत नहीं की तथा मतांतरण को तभी मान्य करने के प्रावधान का सुझाव दिया, जब मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के बाद उसकी निर्दोषिता सत्यापित कर दी जावे | यानि दबाव या प्रलोभन या अनुचित दबाव से किए गए मतांतरण को मान्य नहीं करने के नियम पर वे भी सहमत थे |

सलाहकार  समिति में उपरोक्त प्रावधानों पर विचार करने के समय समिति के अध्यक्ष “बल्लभ भाई पटेल ” ने सुझाव दिया कि “मतांतरण पर रोक संबंधी प्रावधान” बनाने का कार्य बिधयिका (संसद व विधानसभाओं) पर छोड़ देना चाहिए परंतु कई सदस्यों का आग्रह था कि संविधान में भी अनुचित मतांतरण में किसी न किसी प्रकार का प्रावधान होना चाहिए | अतः निम्नांकित प्रावधान के साथ सलाहकार समिति ने अपनी रिपोर्ट संविधान सभा को भेजी –

“Conversion from one religion to another brought about by coercion or undue influence shall not be recognized by law.”(clause 17 ,’framing of India’s constitution  by B. Shiva Rao, page 298).

परंतु उपरोक्त प्रावधान सहित कुछ अन्य प्रावधानों को पुनः विचार हेतु सलाहकार समिति को भेजा गया | सलाहकार समिति ने पुनः विचार करते हुए माना की उपरोक्त प्रावधान ‘एक सुपष्ट सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है| (this clause annunciated a rather obvious doctrine) अतः इसे संविधान में शामिल करने की आवश्यकता नही है | (Framing of India’s Constitution’ by B, Shiva Rao ,page 304-305)

निष्कर्ष -

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि संविधान निर्माताओ को ‘दबाव व अनुचित प्रभाव से होने वाले मतांतरण’ पर गहरी चिंता थी | वे एसे मतांतरण पर रोक संबंधी दंडनीय प्रावधान संविधान में चाहते थे | परंतु यह मानकर कि एसे अनुचित मतांतरण को कानूनी मान्यता हो ही नहीं सकती– यह तो स्पष्ट ही है, और जो बात सर्वमान्य है, उसके लिए संविधान में प्रावधान क्यों किया जाय | संविधान में अवैध मतांतरण पर रोक संबंधी प्रावधान जोड़ा नहीं गया | यदि भविष्य में आवश्यकता हुई तो विधायिका इस संबंध में कानून बनाने को स्वतंत्र होगी | चूँकि अब मतांतरण कि समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है तथा मतांतरण के कारण कानून तथा व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ती जा रही है, तो राज्यों की विधान सभाओं द्वारा ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक‘ जैसा ’मतांतरण विरोधी कानून‘ पारित करना पूरी तरह संवैधानिक होगा तथा संविधान सभा के सदस्यो की भावनाओं के अनुकूल भी होगा |

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अध्याय –4

लड़कियों को भागने वालों पर कानूनी शिकंजा -

यदि लड़की अवयस्क है तो एसे मामले में लागू कानून की धाराएँ –

  1. कानून का नियम यह है कि किसी भी लड़के या लड़की को जिसने अपनी उम्र के अठारह वर्ष पूरे नहीं किए हैं, अर्थात अवयस्क है, उसे उसके संरक्षक की अनुमति के बिना किसी दूसरे स्थान पर नहीं ले जया जा सकता | इस नियम का उल्लंघन होने पर I.P.C. की धारा 363 के अंतर्गत अपहरण (कानूनी शब्द व्यपहरन –Kidnapping) का अपराध बन जाता है| कोई व्यक्ति किसी अवयस्क को उसकी स्वयं कि सहमति से भी उसके संरक्षक अर्थात माता –पिता आदि से दूर नहीं ले जा सकता |

अतः जब किसी अवयस्क लड़की को भगाया जाता है तो हर परिस्थिति में अपहरण का अपराध गठित हो जाता है जिसकी सजा                                             I.P.C. कि धारा 363 में सात वर्ष की है|

2. सामान्यता अवयस्क का अपहरण उसका विवाह किसी से कराये जाने या उसके           साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए ही          किया जाता है | इससे अपराध कि गंभीरता और बढ़ जाती है तथा यह अपराध I॰P.C. कि धारा 366 ले अंतर्गत 10 वर्ष के कारावास से      दंडनीय माना गया है |

  1. जहां अवयस्क लड़की को बहका-फुसला कर भगाया जाता है वहाँ बहुत बार लड़की को अपने साथ घर से कुछ सामान, रुपये, गहने आदि भी ले आने के लिए प्रेरित किया जाता है | यदि लड़की ने एसा किया है तो यह ‘चोरी’ का अपराध हो जवेगा (I॰P.C. की धारा 378) | भागने वाले पर चोरी के लिए उकसाने / दुस्प्रेरना देने का अपराध बनता है (I॰P.C. की धारा 108) |

4.  लड़की को भगा कर ले जाने के मामले में अपहरणकर्ता द्वारा लड़की से शारीरिक संबंध बनाने की पूर्ण संभावना होती है| एसा यदि   ज़ोर जबरदस्ती से होता है तब तो बलात्कार है ही | परंतु लड़की की उम्र 16 वर्ष से कम है तब लड़की कि सहमति से भी शारीरिक संबंध बनाया जाता है तो कानून में उसे बलात्कार ही माना जाता है (I॰P.C. की धारा 375-376)| जिसकी सजा आजीवन कारावास हो सकती है |

  1. यदि लड़की को भागने का कार्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो यह कृत्य आपराधिक षड्यंत्र कि परिभाषा में आयेगा | यदि भगा कर ले जाने वाला एक ही है परंतु लड़की को भगा कर ले जाने में उसका सहयोग अन्य किसी एक या दो व्यक्तियों ने किया है तो एसे सभी लोग “आपराधिक षड्यंत्र” के अपराधी होंगे (I॰P.C. की धारा 120-ख ) एसे सभी व्यक्तियों को सात वर्ष के कारावास से दंडित करने का प्रावधान है |
  2. यदि लड़की को भगाकर किसी अन्य व्यक्ति के घर में छिपाया गया है तो वह छिपाने वाला व्यक्ति( I॰P.C. की धारा 368) में अपराधी होगा, जिसके लिए 10 वर्ष तक के कारावास के दंड का प्रावधान है |
  3. इस प्रकार से यदि किसी नाबालिग लड़की को भगाया जाता है तो निम्नांकित अपराध बन सकते हैं –

* अपहरण (कानूनी शब्द –व्यपहरन) -धारा 363

* विवाह करने या शारीरिक संबंध बनाने हेतु अपहरण – धारा 366

* सदोष परिरोध (Wrongful Confinement)- धारा 342 से 346 व धारा 368

* चोरी –धारा 379-380

* चोरी का दुष्प्रेरण –धारा 108

* बलात्कार –धारा -376

* अपराधिक षड्यंत्र –धारा 120 –ख

कार्यवाही   

 

अतः जैसे ही किसी नाबालिग, अवयस्क या वयस्क लड़की को भगाकर ले जाने की  सूचना प्राप्त हो तुरंत ही उस लड़की के पिता व अन्य परिजनों को लेकर पुलिस थाना जाकर FIR लिखाई जानी चाहिए | FIR में लड़की को भागने वालों, भागने में मदद करने वालों, लड़की को छिपाकर रखने वालों में से जिनके भी नामों की जानकारी हो, FIR में अवश्य दिये जाने चाहिए लड़की जो समान ले गई है उसको भी FIR में चोरी के रूप में लिखा जाना चाहिए तथा उक्त भागने वाले व्यक्ति के प्रेरित करने पर लड़की ने चोरी की – एसा लिखा जाना चाहिए | लड़की अवयस्क है तो उसकी उम्र अवश्य लिखें तथा वह 16 वर्ष से कम हो तो भगाने वाले पर धारा 376 के अनुसार बलात्कार करने के अपराध का भी आरोप लगाया जाना चाहिए तथा FIR में लिखा जाना कि अभियुक्त या अभियुक्तों ने IPC के अंतर्गत अपहरण, चोरी की दुष्प्रेरणा, अपहरण करके उसको छिपाकर रखने, उस लड़की को विवाह के लिए विवश करने के लिए या शारीरिक संबंध बनाने के आशय से अपहरण करने का अपराध किया है | स्पष्ट आरोप लगाया जाकर तुरंत कार्यवाही करने, लड़की को बरामद करने तथा अपराधियों को गिरफ्तार करने की मांग की जानी चाहिए |

यदि थानाधिकारी FIR दर्ज न करें    

यदि थाना अधिकारी FIR दर्ज नही करता है तो संबन्धित पुलिस अधीक्षक (SP) से मिलकर FIR दर्ज करने के लिए कहना चाहिए |FIR की एक प्रति जिला उपखंड अधिकारी (SDM) या जिला कलक्टर को देते हुए उसे आगाह करना चाहिए कि यदि लड़की को बरामद करने तथा अपराधियों को गिरफ्तार करने में देरी हुई तो सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना है |

इस संबंध में धरने, जुलूस आदि के आयोजन का भी विचार करना चाहिए पुलिस व प्रशासन को यदि एसा आभास होता है कि यदि कार्यवाही नही हुई तो क्षेत्र की जनता आंदोलित होगी | तथा सार्वजनिक अशांति फैलेगी | प्रशासन अवश्य कार्यवाही करने को तत्पर होगा |

यदि भगाई गई लड़की वयस्क है  

यदि भगाई गई लड़की वयस्क है तो उसके संरक्षक कि सहमति –असहमति महत्वहीन हो जाती है | परंतु यदि उसे धोखे या कपट से ले जाया जाता है, उसे बहलाया –फुसलाया जाता है, प्रलोभन दिया जाता है या भयभीत कर ले जया जाता है तो यह कृत्य अपहरण माना जाता है (धारा 362 IPC)| एसी अपहरित लड़की को छिपाकर रखने पर (IPC) की धारा 365 व 368, विवाह या शारीरिक सम्बन्धों के लिए विवश करने हेतु अपहरण करने पर धारा 366 आदि का अपराध बन जाता है | यहाँ महत्वपूर्ण बात है कि क्या उक्त लड़की को उसकी बिना सहमति के ले जया गया | यदि वह लड़की बिना किसी प्रलोभन, भय, बहकावे के स्वयं ही अपहरणकर्ता के साथ गई है तो अपराध नही बनेगा | परंतु इसका निश्चय तो तभी हो सकेगा जब उस लड़की को बरामद कर लिया जाए तथा उससे पूछताछ हो | अगर वयस्क लड़की को भागने का मामला हो तो भी तुरंत थाने जाकर FIR दर्ज करनी चाहिए | लड़की को बहला फुसलाकर भगा कर ले जाने उसे कही पर छिपाकर रखने (सदोष परिरोध ), उसका विवाह किसी के साथ करने या उसका यौन शोषण करने के आशय से अपहरण करने, चोरी करने, चोरी के दुष्प्रेरण, आपराधिक षड्यंत्र आदि का आरोप लगाया जाना चाहिए |

यदि कोई लड़की किसी गैर हिन्दू से विवाह करले या करना चाहे

एक हिन्दू लड़की का किसी मुस्लिम लड़के के साथ विवाह तब तक मान्य नहीं होगा जब तक कि लड़की धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम नहीं हो जाती | यद्यपि वयस्क लड़की को धर्म परिवर्तन का अधिकार है | परंतु जहाँ धर्म स्वातंत्र्य कानून बना हुआ है वहाँ यह देखना चाहिए कि क्या धर्म परिवर्तन करने से पूर्व कलक्टर को सूचना देना आदि प्रावधानों का पालन हुआ है कि नहीं | यदि उन प्रावधानों का पालन नहीं हुआ है तो कलक्टर को शिकायत की जानी चाहिए |

परंतु यदि लड़की अवयस्क है तो उसे स्वयं को अपना धर्म बदलने का अधिकार नहीं है | उसके धर्म का निर्धारण करने बदलने का अधिकार उसके संरक्षक, माता –पिता को ही है | फिर भी यदि उक्त अवयस्क हिन्दू लड़की से कोई मुस्लिम लड़का विवाह कर लेता है तो एसा विवाह मान्य नही होगा | क्योंकि बिना धर्म बदले लड़की किसी मुस्लिम से विवाह नही कर सकती तथा धर्म बदलती है तो एसा उसको अधिकार नही है | एसी स्थिति में लड़की के पिता को पुलिस में FIR दर्ज कराके लड़के पर अपहरण का केस लगाकर अपनी लड़की की कस्टडी प्राप्त करनी चाहिए तथा पूर्व में लड़की को भागने के संबंध में बताए गए अनुसार उन सभी धाराओं में मुकदमा लगाया जाना चाहिए |

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अध्याय – 5

 गैर कानूनी है अवैध धार्मिक निर्माण   

 

  1. कोई भी निर्माण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व उसकी स्वीकृति पंचायत, नगर पालिका निगम, स्थानीय प्राधिकारी से लेनी होती है तथा नक्शा पास कराना होता है | यह सामान्य नियम है परंतु यदि कोई धार्मिक निर्माण – मंदिर, मस्जिद, मजार आदि का निर्माण कार्य कराना हो तो इसके लिए स्वीकृति जिला कलक्टर से भी लेने संबंधी नियम प्रायः सभी राज्यों में किसी न किसी अधिनियम द्वारा बनाए हुए है | राजस्थान में “The Rajasthan Religious Building and places Act, 1954 ” बना हुआ है | जिसकी धारा 6 के अनुसार कोई भी सार्वजनिक धार्मिक निर्माण जिला कलक्टर की अनुमति के बिना कराये जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है | अनाधिकृत निर्माण को हटाये जाने तथा संबन्धित व्यक्तियों को सजा दिये जाने के प्रावधान अधिनियम में दिये गए है |
  2. यदि अवैध निर्माण कार्य सरकारी जमीन पे हुआ है तो यह राजस्थान में “The Rajasthan Land Revenue Act, 1954” की धारा 91 के अंतर्गत अपराध है | अतः तहसीलदार को उक्त अवैध निर्माण की शिकायत पर कार्यवाही के लिए कहना चाहिए | यह कृत्य दंडनीय भी है तथा जमीन के मूल्य से 50 गुना तक जुर्माना एवं दो वर्ष के कारावास की सजा दी जा सकती है |

The RajasthanReligiousBuilding and places Act, 1954

इस अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि किसी सार्वजनिक धार्मिक भवन                                       का निर्माण बिना कलक्टर की पूर्वानुमति प्राप्त किए नही कराया जाएगा | कलक्टर की अनुमति लेने से पूर्व सबंधित स्थानीय प्राधिकारी (यथा पंचायत, नगर पालिका, निगम आदि) से भी स्वीकृति लेनी होगी (धारा 6) | इस अधिनियम के अंतर्गत “धार्मिक भवन” शब्द में “मजार” जैसे निर्माण कार्य भी सम्मिलित होंगे |

कभी-कभी पूर्व में कोई मजार आदि छोटा धार्मिक स्थल बना होता है | धीरे-धीरे उसके आस-पास की भूमि को घेरते हुए उक्त धार्मिक स्थान का विस्तार कर दिया जाता है | एसा करने के लिए भी स्थानीय प्राधिकारी तथा जिला कलक्टर की पूर्वानुमति आवश्यक होगी | यदि किसी व्यक्तिगत या सार्वजनिक भवन या स्थान को धार्मिक भवन में बदलना हो तो इस हेतु भी उक्त अधिनियम की धारा 6 के अनुसार दोनों प्रकार की अनुमति आवश्यक है | अन्यथा वह निर्माण अवैध होगा |

कलक्टर को अधिकार दिया जाता है कि वह आवश्यक जांच करने के पश्चात उचित समझे तो उक्त धार्मिक निर्माण के लिए अनुमति देने से इंकार कर दे अथवा सशर्त या शर्तरहित अनुमति प्रदान करे (धारा 7) | परंतु धार्मिक निर्माण कि अनुमति हेतु दिये गए आवेदन पर यदि कलक्टर 3 माह तक निर्णय नही देता है तो यह मान लिया जवेगा की आवेदक को उक्त निर्माण के लिए अनुमति प्राप्त हो गई है | कलक्टर द्वारा दी गई अनुमति अंतिम होगी | उसे किसी दीवानी कार्यालय में चुनौती नही दी जा सकती |

अपराध और दंड

  1. बिना अनुमति धार्मिक निर्माण कार्य करने वाले व्यक्ति को तीन माह तक की कैद या पाँच सौ रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है | बिना अनुमति धार्मिक निर्माण के लिए प्रयास करने वाला या एसे निर्माण के लिए उकसाने वाला भी उक्त दंड का भागी होगा |
  2. अवैध निर्माणकर्ताओं को दंडित करने के लिए स॰डी॰ओ॰ तथा प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के यहाँ शिकायत प्रस्तुत करनी होगी | एसी शिकायत सब इंस्पेक्टर या इससे ऊपर का कोई पुलिस अधिकारी ही कर सकेगा परंतु वह एसा कलक्टर के आदेश पर ही करेगा | अर्थात अवैध धार्मिक निर्माण कर्ता  को दंडित करने के लिए सर्वप्रथम कलक्टर को आदेश जारी कर किसी पुलिस अधिकारी को निर्देश देना पड़ेगा कि वह उस संबंधी शिकायत S.D.O. या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के यहाँ प्रस्तुत करे |

 

अनाधिकृत धार्मिक निर्माण को हटाना

  1. 1.         अधिनियम की धारा 11 (A) क्षेत्र के S.D.O. पर यह दायित्व डालती है कि अनाधिकृत धार्मिक निर्माण की सूचना या जानकारी मिलने पर मामले की जांच करावे तथा यदि सूचना या शिकायत सही पायी जाए तो इसकी रिपोर्ट कलक्टर को करे |
  2. 2.         कलक्टर को S.D.O. से रिपोर्ट प्राप्त होने पर की कोई अनाधिकृत धार्मिक निर्माण होने वाला है या हो रहा है या किया जा चुका है तो कलक्टर का यह दायित्व होगा की उक्त अनाधिकृत निर्माण को रोके, बंद करावे तथा हटाने की  कार्यवाही करे | धारा 11 (A)(2) के अनुसार उसे अनाधिकृत निर्माण की रिपोर्ट S.D.O. से प्राप्त नही हुई है परंतु उसे स्वयं जानकारी है तो वह स्वयंमेव भी अनाधिकृत निर्माण के विरुद्ध कार्य कर सकता है |

अवैध धार्मिक निर्माण हटाने के लिए कलक्टर को निम्नांकित कार्यवाही करनी होती है :-

एक ‘कारण बताओ नोटिस ’(कि क्यों नहीं उक्त निर्माण को हटा दिया जावे ) जारी किया जवेगा | नोटिस जारी होने की सूचना अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को पंहुंच जावे इसके लिए उक्त नोटिस का प्रचार किया जाता है | इस हेतु अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि कलक्टर उक्त नोटिस को अवैध निर्माण कार्यस्थल पर तथा अपने कार्यालय के बाहर चस्पा करावे |

यदि अनाधिकृत निर्मांकर्ताओं की जानकारी हो तो उन्हें भी एसे नोटिस भिजवाए अन्यथा उक्त निर्माण क्षेत्र में ढ़ोल पिटवा कर नोटिस की जानकारी सार्वजनिक करे , ताकि उस अनाधिकृत निर्माण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति नोटिस की तारीख से 15 दिनों में उक्त कारण बताओ नोटिस का जबाब प्रस्तुत करे | कलक्टर आवश्यक समझे तो इस मामले में किसी निर्णय तक पहुंचने तक उक्त निर्माण कार्य को तुरंत रोक दे |

यदि 15 दिनों में किसी व्यक्ति द्वारा जवाब नहीं दिया जाता है तो अथवा जवाब प्रस्तुत किए जाने पर उनकी सुनवाई करने पश्चात कलक्टर इस निर्णय पर पहुंचता है कि उक्त निर्माण कार्य अवैध है या अधिनियम के अनुसार अनुमति लिए बिना किया जा रहा है या किया गया है तो उक्त निर्माण कार्य को हटाने का निर्देश देगा | यदि अवैध निर्माणकर्ता कलक्टर के आदेश से एक माह में उक्त निर्माण को नहीं हटाते हैं तो उक्त निर्माण को हटाने का कार्य पुलिस अधिकारी (SI) के द्वारा कराएगा | उक्त अवैध निर्माण को हटाने में हुए खर्चे की वसूली निर्माणकर्ताओं से की जाएगी |

               

                       शिकायत का प्रपत्र       

सेवा में,

जिला कलक्टर / एस. डी. ओ.

जिला ……………….  प्रांत ……………

विषय :- अवैध निर्माण कर सार्वजनिक स्थल को धार्मिक स्थली / भवन में बिना  अनुमति परिवर्तन करने पर तुरंत रोक लगाने एवं कार्यवाही करने वाबत |

महोदय,

उपरोक्त विषयांतर्गत लेख है कि स्थान ………………. तहसील …………..

जिला …………….. थाना क्षेत्र ……………… निम्नांकित (नाम -स्थान परिवर्तित करने वालों के ) व्यक्तियों द्वारा सार्वजनिक स्थल पर अवैध कब्जा कर अवैध निर्माण धार्मिक स्थल के रूप में कर लिया है |(अथवा पूर्व में स्थापित मजार के आसपास की जमीन पर कब्जा कर बड़ा धार्मिक स्थल निर्मित किया गया है ) जबकि एसा करने से पूर्व स्थानीय निकाय तथा आप श्रीमान की लिखित अनुमति लिया जाना आवश्यक है जोकि नहीं ली गई है |

उपरोक्त धार्मिक निर्माण कार्य से क्षेत्र के निवासियों में रोष तथा क्षोव उत्पन्न हुआ है जिससे किसी भी समय कानून व्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है|

अतः प्रार्थना है कि इस निर्माण पर तुरंत रोक लगाकर अवैध निर्माण को हटाया  जाकर मूल रूप में सार्वजनिक स्थान में परिवर्तित कराये जाने का आदेश प्रदान करें | इस हेतु श्रीमान को “The Rajasthan Religious Building and places Act, 1954” के अंतर्गत व्यापक अघिकार प्राप्त हैं|

हस्ताक्षर व नाम, पता शिकायतकर्ता

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अध्याय – 6 

चंगाई सभाओं द्वारा मतांतरण पर कानूनी रोक

 ईसाई मिशनरियों द्वारा आयोजित चंगाई सभाओं में भोले-भाले ग्रामीणों व समाज के पिछड़े वर्गों का इलाज ईसा मसीह के नाम पर करने का नाटक किया जाता है | यह देखना चाहिये कि वहाँ किन्ही निम्नांकित कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है | यदि कानून का उल्लंघन हो रहा है तो पुलिस में FIR दर्ज करनी चाहिए |

भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम ,1956 की धारा 15(2 ) खंड (ब ) के अनुसार कोई व्यक्ति आधुनिक चिकित्सा पद्धति (एलोपथी ) के अनुसार किसी की चिकित्सा तभी कर सकता है जब निम्नांकित दो शर्तो को पूरा करता हो-

(1) अधिनियम में उल्लेखित योग्यता रखता हो (जैसे एमबीबीएस या MD )

(2) भारतीय चिकित्सा परिषद या राज्य चिकित्सा परिषद में उसका पंजीयन चिकित्सा व्यवसायी के रूप में हो गया हो |

इस प्रकार से यदि किसी व्यक्ति के पास ‘चिकित्सा परिषद ’द्वारा मान्य चिकित्सा संबंधी कोई डिग्री ,डिप्लोमा, लाइसेन्स आदि नहीं है फिर भी जानबूजकर अपने नाम के साथ एसी डिग्री ,डिप्लोमा लगता है या अपने आप को एसे दर्शाता है कि वह पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के अनुसार चिकित्सा करने योग्य है तो एसे  व्यक्ति भारतीय चिकित्सा डिग्री अधिनियम,1916 के अंतर्गत दंड का भागी होगा |

अतः यदि उपरोक्त प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा हो तो FIR दर्ज करनी चाहिए | यदि उक्त प्रावधानों का उल्लंघन नहीं भी हो रहा हो तो भी पुलिस में FIR दर्ज करनी चाहिए कि भोले-भले लोगों को बहलाया फुसलाया जा रहा है | उनके साथ धोखा किया जा रहा है | धर्मांतरण का प्रयास किया जा रहा है | जो कि अपराध एवं गैर कानूनी है | सर्वोच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध मुकदमा ‘स्टेनिस्लास बंम मध्य प्रदेश राज्य’ में निर्णय दिया है कि व्यक्ति स्वयं चाहे तो अपना धर्म बदल सकता है, परंतु दूसरा कोई उसका धर्म नहीं बादल सकता | इसलिए चंगाई सभाओं को इस रूप में प्रचरित किया जाना चाहिए कि वहाँ धर्म परिवर्तन करने का गैर कानूनी कार्य हो रहा है | जिसके कारण समाज में शांति भंग होने कि आशंका है | अतः इन सभाओं को प्रशासन तुरंत बंद करावे  |

जहां पर चंगई सभा या सामूहिक मतांतरण कराये जाने की सूचना हो वहाँ यदि यह दर्शित किया जा सके होने वाले मतांतरण या चंगाई सभा के कारण उस क्षेत्र के लोग विरोध स्वरूप धरणा देने, जुलूस निकालने आदि कार्यक्रम कर रहे है एवं चंगाई सभा या मतांतरण को रोका नहीं गया तो कानून व्यवस्था और लोक शांति भंग होने की आशंका है तो प्रशासन व पुलिस पर इसका दवाब बढ़ सकता है | लिखित में इस हेतु क्षेत्र के कार्यपालक मजिस्ट्रेट को शिकायत करनी चाहिए मजिस्ट्रेट पर दवाब बनाना चाहिए कि उन चंगाई सभा वालों को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P॰C॰) की धारा 107 व 151 में पाबंद कर वैसा न करने के लिए बाध्य करें |

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 अध्याय – 7

 धार्मिक घृणा फैलाने पर कानूनी कार्यवाही  

 

बहुत बार देखने में आया है कि अनेक ईसाई मिशनरी हिन्दू –देवी देवताओं के बारे में अशोभनीय बातें करते हैं ताकि उनके प्रति साधारण हिन्दू के मन में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाए | राजस्थान में कार्यरत ‘इम्मानुअल मिशन’ के कोटा केंद्र पर बेची गई पुस्तक ‘हकीकत’ में एसा ही प्रयास किया गया था | एसे प्रयाशों का मूल उद्देश्य मतांतरण ही रहता है | वे सर्वप्रथम अपने ‘टारगेट ग्रुप’ से संपर्क कर उनके मन मश्तिष्क में उनके धर्म के प्रति अश्रद्धा पैदा करते हैं | मतांतरण उनका पहला कदम होता है यदि इस तरह की जानकारी कही से मिलती है तो भारतीय दंड संहिता की धारा 153-क , धारा 295-क अथवा 298 के अंतर्गत शिकायत की जा सकती है | भारतीय दंड संहिता की धारा 153 क में प्रावधान है कि जब किसी व्यक्ति के कार्य से विभिन्न धार्मिक समूहों के मध्य सौहार्द पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तो एसा कृत्य अपराध होगा | जिसकी सजा 3 वर्ष तक का कारावास है | किसी धर्म विशेष के बारे में अश्रद्धा उत्पन्न करने के प्रयास से लोगों का आक्रोशित होना स्वभावइक ही है, अतः एसे प्रकरणों में धारा 153-क लागू होती है |

भारतीय दंड संहिता की धारा 295-क वह लागू होती है जहाँ किसी ने जानबूझझकर विद्वेषपूर्ण आशय से किसी दूसरे वर्ग की धार्मिक भावनाओं या विश्वासों का अपमान किसी भी प्रकार से किया है धार्मिक भावनाओं का अपमान किए जाने का कृत्य ,लिखित मौखिक, संदेशों द्वारा, चित्रो द्वारा या अन्यथा किसी भी प्रकार से हो सकता है | शांति भंग होने या संभावना होने के तथ्य को इस धारा के लिए सिद्ध करना आवश्यक नही है | धारा 295-क के अंतर्गत किए गए अपराध कृत्य को संज्ञेय या गैर जमानती की श्रेनी में रखा गया है | अर्थात इस तरह के अपराध में साक्ष्य प्रस्तुत करना भी आवश्यक नहीं है पुलिस स्वयं ही संग्यान लेते हुए अभियुक्तों को गिरफ्तार कर सकती है | एसे अभियुक्तों को पुलिस अधिकारी जमानत नहीं दे सकेंगे | केवल न्यायालय से ही जमानत हो सकती है | परंतु इस धारा में कार्यवही करने से पूर्व पुलिस व प्रशासन को राज्य सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करनी पड़ती है |

धारा 295-क के अंतर्गत अपराध कृत्य (धार्मिक भावना या विश्वासों को ठेस पहुंचाना) शिकायतकर्ता या पीड़ित पक्ष के सम्मुख करना आवश्यक नहीं है | परंतु यदि किसी कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कार्य इस तरह से बोल कर या किसी प्रकार की ध्वनि निकाल कर किया जाता है | कि अन्य धर्माबलम्बी व्यक्ति को सुनाई पड़े या एसे हाव भाव, भंगिमा बनाकर अथवा किसी वस्तु के माध्यम से किया जाता है कि उस व्यक्ति को दिखाई पड़े तो यह धारा -298 का अपराध होगा | धारा 295-क में 3 वर्ष तक तथा धारा 298 में एक वर्ष तक का कारावास दिया जाता है |

भारतीय दंड संहिता की धारा 153-क या 295-क के अंतर्गत दंडनीय कृत्य किए जाने की संभावना होने पर आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 108 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट संबन्धित व्यक्ति को एसा कृत्य न करने के लिए पाबंद भी कर सकता है |

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 अध्याय – 8 

 विदेशी नागरिक का अवैध निवास

 

यदि कोई विदेशी नागरिक वीजा के बिना कहीं रहता हुआ पाया जाए तो यह “The Foreigners Act” तथा “The immigration Act” का उल्लंघन होगा | इसकी FIR संबन्धित थाने में दर्ज की जावे | कलक्टर या अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को भी शिकायत की जानी चाहिए | राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव ,गृहमंत्री तथा मुख्यमंत्री को भी सूचना भेजनी चाहिए |

यदि थानाधिकारी FIR दर्ज नहीं करता है तो FIR की प्रति जिले के पुलिस अधीक्षक को रेजिस्टर्ड डाक से भिजवा देनी चाहिए तब पुलिस अधीक्षक का कर्तव्य होगा कि FIR दर्ज कराकर कार्यवाही प्रारम्भ कारवें |

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 200 के अंतर्गत संबन्धित क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी (यदि FIR दर्ज नहीं होती है तो ) परिवाद प्रस्तुत की जा सकती है |

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 अध्याय – 9 

 FIR दर्ज करने का तरीका

 

1. जब कभी भी किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा कोई अपराध कार्य किया जावे तो पीड़ित पक्ष या उक्त अपराध होने की जानकारी रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह उस अपराध होने की सूचना नजदीकी पुलिस स्टेशन के थाना अधिकारी को दे | थाना अधिकारी को अपराध की सूचना लिखित या मौखिक दी जा सकती है इसे FIR कहा जाता है |

थानाधिकारी का कानूनी कर्तव्य है कि वह अपने रजिस्टर में FIR दर्ज कर उसकी प्रति शिकायत कर्ता को उपलब्द करावें (Cr॰P॰C॰ की धारा 154,155 )|

2॰ यदि थाना अधिकारी FIR दर्ज नहीं करता है तो उस FIR की प्रति जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को रेजिस्टर्ड डाक से भिजवानी चाहिए | पुलिस अधीक्षक का कर्तव्य होगा कि उस FIR को दर्ज कराकर तुरंत कार्यवाही प्रारम्भ कराएं | FIR थानाधिकारी द्वारा दर्ज न करने पर उसकी एक प्रति जिला कलक्टर को भी कार्यवाही हेतु भेजना ठीक रहता है |

3. यदि फिर भी FIR दर्ज होकर पुलिस कार्यवाही (जांच ,अन्वेषन आदि ) प्रारम्भ  नहीं होती है तो संबन्धित क्षेत्र के ज्यूड़ीशियल मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक प्रक्रिया संहिता के धारा 200 के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत की जावे | तब उक्त मजिस्ट्रेट (Cr॰P॰C॰) की धारा 202 के अंतर्गत बयान लेने के बाद प्रसंग्यान लेकर स्वयं भी जांच कर सकता है और कार्यवाही आगे बढ़ा सकता है |

4. प्राथमिक सूचना रिपोर्ट लिखते समय उसमें निम्नांकित तथ्य सम्मिलित करने चाहिए –

*  अपराध होने का दिनांक

*  अपराधियों के नाम

*  अपराध का घटनाक्रम

*  साक्षियों के नाम

*  अपराधियों का पूर्व इतिहास

*  अपराधियों का पूर्व आचरण

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  अध्याय – 10 

  पर्यटक बीजाधारियों की मिशनरी गतिविधियों पर प्रतिबंध

 कोई भी विदेशी व्यक्ति भारत में तभी प्रवेश कर सकता है जब उसके पास भारत द्वारा जारी किया गया वैध वीजा हो | वीजा के आवेदक को स्पष्ट करना होता है कि वह किन कारणों से भारत आना चाहता है और कितने दिनों तक भारत में रहना चाहता है | अलग –अलग उद्देश्यों के लिए अलग –अलग वीजा जारी किए जाते है | उदाहरण के लिए व्यापारिक वीजा, नियोजन वीजा, टूरिस्ट वीजा आदि | एक बार भारत पहुंचने के पश्चात किसी भी विदेशी को अपनी यात्रा का उद्देश्य बदलने की अनुमति नहीं है | जिस उद्देश्य के लिए वीजा जारी किया गया है, एक विदेशी व्यक्ति को उसी उद्देश्य के लिए ही भारत में निर्धारित अवधि तक निवास का अधिकार है | ट्यूरिस्ट वीजा प्राप्त करना सरल होता है | अन्य कार्यों के लिए वीजा देने से पूर्व कई ओपचारिकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है | अतः बहुत से विदेशी व्यक्ति ट्यूरिस्ट वीजा पर भारत आने के पश्चात दूसरी गतिविधियों में भी संलग्न हो जाते है जो की गैर कानूनी है | प्रशाशन व पुलिश का दायित्व होता है कि वह भारत में आए हुआ विदेशी व्यक्तियों पर नजर रखे पुलिस व प्रशासन को जांच करती रहनी चाहिए कि ट्यूरिस्ट वीजा पर भारत आया कोई विदेशी किसी अवांछित गतिविधि में संलग्न तो नहीं हो रहा है |

ट्यूरिस्ट वीजा पर आए अनेक व्यक्ति ईसाई मिशनरीज़ की गतिविधियों में भाग लेते है तथा इसाइयों की धार्मिक सभा, चंगाई सभा आदि को संबोधित करते हैं जो गैर कानूनी है | अतः जन साधारण को भी जागरूक रहकर देखना चाहिए कि चंगाई सभा या ईसाई धार्मिक सभा आदि को यदि कोई विदेशी संबोधित करने वाला है या संबोधित कर रहा है तो क्या उसके पास उक्त उद्देश्य के लिए जारी वीजा है | ट्यूरिस्ट वीजा पर आया व्यक्ति किसी सभा के मंच पर भी नहीं बैठ सकता | यदि वीजा नियमों का उल्लंघन होता दिखाई दे तो इसकी सूचना प्रशास तथा पुलिस को अवश्य दी जानी चाहिए तथा दबाब बनाया जाना चाहिए कि एसे मामलों में पुलिस अवश्य कार्यवाही करे | यदि पुलिस को लगेगा कि कार्यवाही ना करने पर कानून व्यवस्था कि स्थिति बिगड़ सकती है तो वह अवश्य कार्यवाही करेगी |

कार्यकर्ताओं की जानकारी हेतु विभिन्न प्रकार के वीजा एवं उनके संबंध में आवश्यक सूचनाएँ नीचे दी जा रही हैं –

  1. ट्यूरिस्ट वीजा 6 माह से 10 वर्ष के लिए मान्य | 10 वर्षीय वीजा केवल अमेरिकी नागरिकों को ही जारी होता है | परंतु प्रत्येक भारत भ्रमण पर एक बार में अधिकतम 6 माह तक ही रुकने की छूट होती है |
  2. व्यापारिक वीजा – 6 माह या अधिक के लिए मान्य | परन्तू एक बार में अधिकतम 6 माह के लिए रुकने की छूट | इस वीजा हेतु प्रायोजित संगठन –संस्था का पत्र आवश्यक है जिसमें आवेदक के व्यापार की प्रकृति, रुकने की संभावित अवधि, वे स्थान या संस्थाएं जहां वह व्यक्ति भ्रमण करेगा तथा उसके खर्चो को वहाँ करने की गारंटी आदि का उल्लेख हो | विदेशी व्यापारी जिन्होने भारत में संयुक्त उद्यम शापित किया है या करना चाहते हैं, उन्हें 10 वर्ष तक मान्य वीजा दिया जा सकता है ताकि वे जब भी आवश्यकता हो , भारत में आ सकें |
  3. नियोजन वीजा यदि  किसी विदेशी को भारत में पंजीक्रत कोई कंपनी नौकरी पर रखती है , तो एसे वीजा हेतु नियुक्ति पत्र आवेदक की व्यक्तिगत सूचनाएँ, कंपनी का भारत में पंजीयन प्रमाण पत्र आदि की आवश्यकता होती है | वीजा अवधि नियोजन संविदा की अवधि पर निर्भर करेगी |
  4. विद्यार्थी वीजा भारत में स्थित मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं में नियमित अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए जारी | इसकी अवधि भारत में अध्ययन अवधि तक मान्य |
  5. पत्रकार वीजा व्यावसायिक पत्रकारों व फोटोग्राफरों को भारत में तीन माह तक रुकने हेतु जारी किया जाता है |
  6. अधिवेशन वीजा विभिन्न अधिवेशन या संगोष्ठी में भाग लेने के लिए जारी किया जाता है |
  7. प्रवेश वीजा भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को विभिन्न समयों पर भारत आने के लिए 6 माह से 5 वर्ष तक के लिए जारी किया जाता है |
  8. मिशनरीज़ वीजा भारत सरकार द्वारा अनुमोदित अवधि के लिए एक वार भारत आने हेतु जारी किया जाता है | इस हेतु प्रायोजित संगठन का पत्र आवश्यक है जिसमें वह व्यक्ति भारत में कहाँ जाने का इच्छुक है, उसके निवास की संभावित अवधि क्या होगी तथा उसकी द्वारा भारत में किए जाने वाले कार्य की प्रकृति क्या है, आदि का उल्लेख हो |

मिशनरीज़ कार्यों के लिए वीजा लेकर भारत आने वाले विदेशियों के लिए अमेरिका गृह विभाग द्वारा जारी किया गया निम्नांकित निर्देश इस संबंध में दृष्टव्य है –

भारत सरकार ने, किसी भी धार्मिक समूह की विदेशी मिशनरीज़ को बिना पूर्व अनुमति लिए भारत में प्रवेश करने पर रोक लगा रखी है | बिना उचित वीजा के जो लोग मिशनरी कार्य करते हैं, उन्हे भारत से निकाल दिया जाता है | लंबे समय से कार्यरत विदेशी मशनरीज़ समान्यतया अपने वीजा का नवीनीकरण करा सकते है | परंतु भारत सरकार ने 1960 के बाद किसी नए विदेशी मिशनरी को भारत में निवास की अनुमति नही दी है | यद्यपि भारत में एसा कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है जो किसी विदेशी पर धार्मिक विश्वासों को मानने या प्रचार पर रोक लगाता हो, तो भी देश का विदेशी – अधिनियम दूसरों के धार्मिक विश्वासों के विरूद्ध सार्वजनिक रूप से बोलने पर रोक लगाता है, क्योंकि एसा लोक व्यवस्था के लिए खतरनाक माना जाता है यह अधिनियम ट्यूरिस्ट वीजा पर भारत भ्रमण करने वालों को गृह मंत्रालय की बिना पूर्व अनुमति के धार्मिक प्रचार करने के लिए प्रतिबंधित करता है |(Extract from website of American state Department )

अवैध वीजाधारियों को भारत से बाहर निकालना 

ट्यूरिस्ट वीजा पर भारत आए अनेक विदेशियों को  समय समय पर भारत से बाहर निकाला जाता रहा है | देखने में आया है कि पुलिस यह कार्य तभी करती है जब उस क्षेत्र की जागरूक जनता या कोई संगठन इस तरह की शिकायत पुलिस से करता है जबकि पुलिस का कर्तव्य है कि वह स्वयमेव ही अवैध विदेशियों को भारत से बाहर निकाले |

‘ दि हिन्दू ’ समाचार पत्र के 14 जून 2005 के अंक में छपे समाचार के अनुसार मुंबई के मलाड क्षेत्र से चार अमेरिकी नागरिकों फिलिप्स एनल, क्लोवर एडवर्ड, रिचर्ड जेनल तथा एक अन्य को पुलिस ने गिरफ्तार कर भारत से बाहर भेज दिया क्योंकि उसके पास वैध मिशनरी वीजा नहीं था जबकि ये लोग मिशनरी गतिविधियों में संलग्न थे | पुलिस ने यह कदम तब उठाया जब लोगों के एक समूह ने इन विदेशियों पर आक्रमण कर दिया | 6 फरवरी 2006 को केरल के तिरूअनंतपुरम से तीन अमेरिकी मिशनरीज़ को वीजा नियमों का उल्लंघन करने पर भारत से बाहर भेज दिया | डेविस हेज, कार माइकल तथा टेलर डेविड ली नाम के इन विदेशियों के पास ट्यूरिस्ट एवं व्यापारिक वीजा था , जबकि ये लोग राज्य में ईसाई मिशनरीज़ के कार्यक्रम में संलग्न पाये गए | पुलिस द्वारा यह कार्यवाही ‘हिनद्दू एक्य वेदी संगठन ’ तथा ‘आर. एस. एस’ द्वारा शिकायतें मिलने के बाद की गई |

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 अध्याय – 11 

 वीजा नियमों का उल्लंघन और कानूनी कार्यवाही  (खबरों में)

  भारत सरकार की काउन्सलर इन्फॉर्मेशन शीट

    कोई भी विदेशी नागरिक ट्यूरिस्ट वीजा धारण करके मिशनरी गतिविधियों में लिप्त नहीं रह सकता | एसी स्थिति में उसे देश वापिसी तथा कानूनी दंड झेलना पड़  सकता है | मिशनरी गतिविधियों हेतु केवल मिशनरी वीजा ही स्वीकृत है |

तथ्य : सन 1960 के बाद भारत में एक भी मिशनरी वीजा स्वीकृत नहीं किया गया |

द हिन्दू : 14 जून 2005    

चार अमेरिकी नागरिकों को देश वापिस भेजने की तैयारी | मुंबई पुलिस की स्पेशल ब्रांच द्वारा पूछताछ के बाद उनके ईसाई मिशनरी होने एवं धर्मांतरण में लिप्त होने संदेह में वीजा नियमों के उल्लंघन के तहत भारत छोड़ने के लिए बाध्य किया गया |

ट्रिब्यून इंडिया :20 जनवरी   

वीजा नियमों के उल्लंघन करने एवं गलत वीजा पर मिशनरी गतिविधियां करने पर यू॰ एस॰ मिशनरी जोसफ डब्ल्यू कपूर को देश छोड़ने का आदेश |

 इंडियन एक्सप्रेस : 22 जुलाई 2008 

प्रार्थना के दौरान उत्प्रेरणा करने के आरोप मेन तीन अमेरिकी नागरिक फ़ोरनर्स  एक्ट के तहत गिरफ्तार |

सिफी : 2 फरवरी 2006

टूरिस्ट वीजा पर भारत आया अमेरिकी नागरिक धर्मांतरण गतिविधियों में लिप्त पाये जाने पर पुलिस द्वारा तुरंत कार्यवाही |          

  
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 अध्याय – 12

 सूचना का अधिकार मतांतरण रोकने में सहायक

भारत सरकार द्वारा सन 2005 में बनाए गए कानून ‘सूचना का अधिकार ,   अधिनियम 2005 ’ का उपयोग मतांतरण कार्यों में संलग्न ईसाई मिशनरीज़ तथा विदेशों से भारत में आकर मतांतरण में लगे ईसाई पादरियों के बारे में बिबिध जानकारी प्राप्त करने हेतु किया जाता है | इस प्रकार से प्राप्त जानकारी मतांतरण गतिविधियों में अंकुश लगाने में सहायक होगी | यह कानून मूलतः केंद्र व राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों एवं कार्यालयों से उनके द्वारा संपादित कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए बनाया गया है, ताकि नागरिक उस प्राप्त जानकारी के आधार पर सरकरी कार्यों पर नजर रख सकें | साथ ही यह भी कि  सरकरी कार्यों में पारदर्शिता आए तथा भ्रष्ट व गैर कानूनी कार्यों पर रोक लग सके |

अधिनियम की धारा 2(H) के अनुसार किसी प्राइवेट संस्था से संबन्धित एसी सूचनाएँ भी सरकार से मांगी जा सकती है जिस तक किसी अन्य विधि के अधीन किसी लोक प्राधिकारी की पहुँच हो सकती है | ईसाई मिसनरीज़ द्वारा चलायी जा रही विभिन्न संस्थाएं यथा स्कूल कालेज, चिकित्सालय, अनाथालय आदि का पंजीकरण सोसाइटी एक्ट जैसे किसी न किसी कानून के अंतर्गत करना आवश्यक होता है | इन संस्थाओं को विदेश से प्राप्त धन सरकार की जानकारी में रहता है |अतः कहा जा सकता है कि किसी न किसी लोक प्राधिकारी की पहुँच ईसाई मिशनरीज़ की इन संस्थाओं तक रहती है | अतः ईसाई मिशनरीज़ तथा उनके द्वारा संचालित चिकित्सालय अनाथालय, विद्यालया आदि के बारे में भी इस अधिनियम के अंतर्गत अनेक प्रकार की सूचनाएँ तथा जानकारी प्राप्त की जा सकती है |

विदेशों से प्राप्त धन संबंधी जानकारी 

ईसाई मिशनरीज़ को विदेशों से विशेषकर अमेरिका व यूरोप से अपर धन मिलता है | अधिनियम के अंतर्गत विदेश मंत्रालय के संबन्धित विभाग से जानकारी मांगी जा सकती है | कि किन किन संस्थाओं को विदेशों से कितना धन प्राप्त हो रहा है | यह धन उन्हें किस प्रकार का कार्य करने के लिए दिया जा रहा है? एक उत्तरदायी सरकार का कर्तव्य होता है कि भारत आ रहे विदेशी धन पर नजर रखे सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उस धन का उपयोग किसी गैर कानूनी कार्य के लिए तो नही हो रहा है अतः सूचना के अधिकार के अंतर्गत निश्चित रूप से गृह मंत्रालय के संबन्धित विभाग से सूचना मांगी जा सकती है कि विदेशों से आ रहे धन का उपयोग संस्थाएं किन कार्यों में कर रही है | इस प्रकार प्राप्त सूचना से हम भी ईसाई मिशनरीज़ को प्राप्त धन उस धन के व्यय मद तथा वास्तव में किस कार्य पर खर्च किया जा रहा है इस पर नजर रख सकते है | यदि यह पाया जाए कि विदेशी धन का दुरूपयोग हो रहा है तो इसकी शिकायत कलक्टर, पुलिस, विधायक, संबन्धित सचिव, मंत्री, मुख्य मंत्री आदि को करनी चाहिए |

किसी भी जिले में कितनी ईसाई मिशनरीज़ कार्य कर रही है, उन्हें किन-किन स्रोतों से धन मिल रहा है, उन्होने उस धन को किन कार्यो पर लगाया – यह सब सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए जिला कलक्टर या जिले के सूचना अधिकारी को भी आवेदन किया जा सकता है |

मदरसों व अन्य इस्लामिक संस्थाओ को अरब व खड़ी देशो से बड़े मात्रा में धन आ रहा है | इस धन पर और उसके उपयोग पर भी उपरोक्त प्रकार से नजर रखी जा सकती है |

वीजा पर आए विदेशी व्यक्तियों के बारे में जानकारी       

विदेशों से समय-समय पर अनेक ईसाई पादरी भारत आते रहते हैं ,उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए भारत में रहने का वीजा मिलता है | जिला कलक्टर या पुलिस अधिकारी से इस संबंध में सूचना लेते रहना चाहिए ताकि हमें भी जानकारी हो सके कि वीजा समाप्ति के बाद भी कोई पादरी या विशेष व्यक्ति भारत में रह तो नही रहा है | अधिकांश विदेशी व्यक्ति टूरिस्ट वीजा पर आते है एसे व्यक्ति मिशनरी की गतिविधियों में सक्रिय भाग नही ले सकते | वे किसी सभा को संबोधित नहीं कर सकते अतः सूचना के अधिकार अधिनियम के द्वारा हम लोग थोड़ा प्रयत्न करके मिशनरीज़ कार्यों में विदेशियों कि संलग्नता को रोक सकते है राजस्थान के कोटा शहर में इसाइयों की धार्मिक सभा, जिसका अघोषित उद्द्येश्य मतांतरण ही था, के मंच पर टूरिस्ट वीजा पर आए विदेशी बैठे थे |

जिसकी शिकायत पुलिस प्रशासन को करने पर उन विदेशियों को मंच छोड़ना पड़ा वे सभा को संबोधित ही नही कर पाये  | उस अवसर पर बड़ी संख्या में साइकिलें मंगाई गई थीं | जो नवदीक्षित इसाइयों में बांटी जानी थी परंतु जनता व कार्यकर्ताओं के विरोध और सजकता के कारण ना तो मतांतरण का कार्य हो सका और ना ही साइकिलों का वितरण |

अवैध बांग्लादेशियों  व पाकिस्तानियों की जानकारी  

भारत में बड़ी संख्या में  बांग्लादेश से गुसपैठ हो रही है | अवैध रूप से रह रहे इन लोगों को गिरफ्तार करने का दायित्व पुलिस का है | प्रशासन का दायित्व है कि इन्हें देश से बाहर निकाले | सूचना के अधिकार के अंतर्गत जिला पुलिस अधिकारी से पूछा जा सकता है कि उस जिले में अवैध रूप से कितने बंगलादेशी रह रहे है | तथा कितनों को गिरफ्तार कर आवश्यक कार्यवाही कि गई |

पाकिस्तान व भारत के मध्य रेल तथा बस सेवा चालू होने के कारण बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक कुछ दिनों का वीजा लेकर भारत में आते है, परंतु इनमें से बहुत वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी भारत से नहीं जाते | एसे लोगों की जानकारी प्रशासन से मांगी जा सकती है जिला पुलिस तथा प्रशासन का दायित्व है कि एसे मामलों का पूरा रिकार्ड रखे |

नई बनने वाली मजार आदि के बारे में जानकारी  

कोई भी पूजा का स्थान या भवन बनाने से पूर्व उसकी अनुमति स्थानीय निकाय (निगम, नगर पालिका, पंचायत) से लेने के पश्चात कलक्टर से अनुमति लेने संबंधी कानून सभी राज्यों में बने हुए है | यदि अनुमति नही ली जाती है तो

कलक्टर का दायित्व होता है कि वह उस निर्माण को हटा दे | अतः यदि एसी जानकारी मिले कि कोई अवैध मजार या दरगाह बनाई जा रही है तो उसकी शिकायत पुलिस या प्रशासन को करने के साथ ही सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी माँगनी चाहिए कि उक्त मजार के निर्माण हेतु किसने और कब अनुमति मांगी ? क्या अनुमति दी गई ? यदि अनुमति नहीं मांगी या नही दी गई तो   प्रशासन ने, कलक्टर ने उस अवैध मजार दरगाह आदि को हटाने के लिए विधि में निर्धारित कार्यवाही की या नहीं की ? इस तरह के प्रयासों से प्रशासन तथा पुलिस पर प्रभाव पड़ेगा तथा अवैध मजार निर्माण पर अंकुश लग सकेगा |

मतांतरण संबंधी जानकारी     

कुछ राज्यों में ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम ‘ बने हुए हैं , जिनमें लोभ –लालच या दबाव भय आदि से मतांतरण करने करने को अपराध माना गया है | साथ ही मतांतरण से पूर्व जिला प्रशाशन को सूचना दिए जाने का प्रावधान है | उन राज्यों में मतांतरण की सूचना होने की सूचना मिलने पर संबन्धित कलक्टर से अधिनियम के अंतर्गत सूचना मांगी जानी चाहिए कि क्या मतांतरण से पूर्व उन्हे सूचित किया गया  था और यदि सूचित नही किया गया तो उन्होने क्या कार्यवही की | यदि सूचित किया गया था तो क्या उन्होने छानबीन कराई ?

सूचना के अधिकार के अंतर्गत किसी सरकारी अधिकारी से सूचना ही मांगी जा सकती है कोई शिकायत नहीं की जा सकती और ना ही किसी कार्यवही के लिए कहा जा सकता है परंतु इस अधिकार का उपयोग करने से अधिकारी गण अपने कर्तव्य के प्रति उन्मुख होते है | तथा हमें जो जानकारी मिलते है उसके आधार पर अन्य क़ानूनों के तहत कार्यवाही कराये जाने का प्रयास किया जा सकता है |

शुल्क एवं आवेदन का प्रारूप

सूचना के अधिकार अधिनियन के अंतर्गत किसी भी कार्यालय से सूचना प्राप्त करने हेतु उस विभाग के लोक सूचना अधिकारी या सहायक लोक सूचना अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत करना होता है इस संबंध में कई राज्यों ने नियम बनाकर आवेदन पत्र का प्रारूप निर्धारित कर दिया है इस प्रारूप का अक्षरशः पालन करना आवश्यक नहीं है , परंतु एक अवदान कर्ता को अपने आवेदन पत्र में संबन्धित प्रारूप में अपेक्षित सभी विंदुओं पर जानकारी का उल्लेख कर देना चाहिए –

                                                        सूचना हेतु आवेदन पत्र का प्रारूप 

 

प्रति,

लोक सूचना अधिकारी

(या सहायक लोक सूचना अधिकारी)

विभाग –

पता –

महोदय ,

‘सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6’ के अंतर्गत मैं यह आवेदन प्रस्तुत कर रहा हूँ | आवश्यक विवरण निम्नानुसार है |

1.    आवेदक का पूरा नाम           :

2.    पिता \पति का नाम            :

3.    पूरा पता                     :

4.    जो सूचना चाहिए, उसका विवरण :

…………………………………………………………………………………………………………………………

…………………………………………………………………………………………………………………………

…………………………………………………………………………………………………………………………

5.  मैं यह उल्लेखित कर्ता हूँ कि मेरे द्वारा चाही गई सूचना उक्त अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत ‘सूचना प्रकट किए जाने से छूट’

6.    (क) आवश्यक शुल्क रुपये 10 /- कि राशि पोस्टल ऑर्डर /डीडी / ट्रेजरी   चालन /…………./ आपके कार्यालय की जमा रशीद (क्र. …………………… दिनांक ……………) द्वारा जमा कराई जा रही है जो कि इस आवेदन के साथ संलग्न है |

या (ख) मैं बी.पी.एल. परिवार से हूँ  |इस संबंधी प्रमाण पत्र की प्रति संलग्न कर रहा हूँ |

स्थान    :

दिनांक   :

आवेदक के हस्ताक्षर

(नाम           )

                                                    फोन /मो. न.

 

सूचना प्राप्त करने का शुल्क 10 /- रुपये निर्धारित है | इसे पोस्टल ऑर्डर /मनी ऑर्डर , बैंक के डीडी , ट्रेजरी चालान आदि से जमा कराया जा सकता है या फिर संबन्धित कार्यालय में नगद जमा करा सकते है | डीडी या पोस्टल ऑर्डर आदि ‘लोक सूचना अधिकारी या सहायक लोक सूचना अधिकारी (विभाग का उल्लेख करते हुए) ‘के नाम बनबाना चाहिए | महाराष्ट्र में नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प आवेदन पत्र पर लगाकर भी आवेदन कर सकते है | बीपीएल  परिवार के सदस्य को शुल्क से छूट दी गई है |

                              
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  अध्याय – 13 

  धार्मिक स्थलों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण – कैसे हो नियंत्रण ?

 पूजा स्थल, मस्जिद, उत्सव, चंगाई सभाओं आदि में लाउडस्पीकर के प्रयोग तथा उसकी सीमा के संबंध में मौलिक अधिकारों का प्रश्न उठाया जा रहा है | संबिधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त धार्मिक स्वतन्त्रता तथा अनुच्छेद 19 (1) (अ) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के संदर्भ में लाउडस्पीकर जैसे ध्वनि यंत्रो का प्रयोग करने के संबंध में कई प्रमुख वाद उल्लेखनीय है |

बेदी गुरुचरण सिंह बनाम हरियाना राज्य (1975 क्रि. ला. जर्नल, 917 )

के बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि “संबिधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति या धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार अनियन्त्रित एवं निरपेक्ष नही है | स्वतन्त्रता पूर्वक धर्म का प्रचार करने का अधिकार इस शर्त के अधीन है कि किसी दूसरे धर्म के अनुयाइयों के अधिकार का उल्लंघन नहीं हो | दूसरे धर्म के मानने वालों को लाउडस्पीकर आदि से संबोधित करने के अधिकार को तब मान्य नहीं किया जा सकता जब वे इसका विरोध कर रहे हों तथा शांति भंग हो सकती हो |” उदाहरण के लिए जब ईसाई मिशनरीज़ जन जातीय या पिछड़े वर्गों के लोगों को चंगाई सभा या अन्य धार्मिक सभा के नाम पर लाउडस्पीकर से संबोधित कर रहे हों और उसका कुछ लोग विरोध कर रहे हों तो एसे धर्म प्रचार का अधिकार मान्य नहीं हो सकता तथा वहाँ लाउडस्पीकर के उपयोग पर रोक लगाना उचित ही होगा |

मसूद आलम बनाम पुलिस आयुक्त (59 कलकत्ता वीकली नोट्स,293, 1954 -55) के मामले में पुलिस आयुक्त ने 5 बार दिन में ‘अजान’ हेतु विद्युत लाउडस्पीकर के प्रयोग  को प्रतिबंधित कर दिया था | आयुक्त के आदेश को चुनौती धार्मिक स्वतन्त्रता के उल्लंघन के आधार पर दी गई | न्यायालय ने ‘अजान’ हेतु लाउडस्पीकर के प्रयोग पर लगाए गए प्रतिबंध आदेश को वैध मानते हुए कहा कि धार्मिक विश्वास एवं आस्था लोक व्यवस्था , नैतिकता एवं स्वस्थ्य के अधीन है | परंतु कलकत्ता उच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रार्थना में प्रयोग करना ध्वनि प्रदूषण नही माना जा सकता है न्यायालय ने कहा कि लोकप्रिय त्योहारों पर देव प्रतिमा की पूजा एवं आरती धोक, ढ़ोल तथा मृदंग जैसे परंपरागत वाद्य यंत्रों से ध्वनि पर कोई रोक नहीं है यदि माइक्रोफोन का प्रयोग हो रहा हो तो उसकी ध्वनि को डेसीबल की निर्धारित सीमा में रखना आवश्यक है |

 

चर्च ऑफ गॉड (फुलगास्पेल) इन इंडिया बनाम के.के.आर मजेस्टिक कॉलोनी वेलफ़ेयर एसोसिएसन (2000 , 7 सु. को. केसेज, 282 )

के मामले में तथ्य थे कि चर्च के पास पेंटेकोस्टल क्रिश्चियनों के लिए निर्मित प्रार्थना हॉल में ड्रम सेट, त्रिपुल मेंगों, गिटार आदि संगीत वाद्य यंत्रो सहित प्रार्थना होती थी मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि चर्च से अपेक्षा की जाय कि वह अपने स्पीकरों की आवाज नीचे स्तर तक रखे | यदि अनुमत डेसीबल से ज्यादा ध्वनि चर्च द्वारा उत्पन्न की जावे तो उसका उपशमन होना चाहिए | उच्चतम न्यायालय ने अपील होने पर उच्च न्यायालय के निर्णय को बहाल रखा |

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निःसन्देह कोई भी धर्म यह निर्धारित नहीं करता कि प्रार्थना दूसरों की शांति भंग कर की जानी चाहिए |

और नहीं यह निर्धारित करता है कि धर्मोपदेश ध्वनि विस्तारकों द्वारा अथवा नगाड़ा पीटकर करना चाहिए | ध्वनि के संबंध में निर्धारित मापदण्डों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है |

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत ‘ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण ) नियम ,2000’ बनाए गए है | इनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों / प्रखंडों के लिए ध्वनि हेतु व्यापक मानक निर्धारित किए गए है | मानक जो अनुसूची एक में दिये गए है, इस प्रकार से है –

ध्वनि के संबंध में व्यापक वायु गुणवत्ता मानक   

क्षेत्र संकेतांक क्षेत्र /प्रखण्ड की श्रेणी डेसीबल (A) Leq में सीमा
दिन के समय रात्री के समय
(A)(B)
(C)
(D)
औद्योगिक क्षेत्र
वाणिज्यिक क्षेत्र
आवासीय क्षेत्र
शांति क्षेत्र
75
65
55
50
70
55
45
40

प्रातः 6 बजे से रात्री दस बजे का समय ‘दिन का समय ’तथा रात्री दस बजे से प्रातः 6 बजे का समय ‘रात्री समय’ माना गया है शांति क्षेत्रों में अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थाओं  तथा न्यायालयों से 100 मीटर की दूरी तक का क्षेत्र सम्मिलित है | ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियमावली, 2000 के नियम चार के अनुसार किसी क्षेत्र /प्रखण्ड क ध्वनि स्तर अनुसूची में निर्दिष्ट ध्वनि मानक से अधिक नहीं होना चाहिए  किसी जिले के जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर तथा अन्य संबन्धित अधिकारियों पर पर यह ज़िम्मेदारी डाली गई है कि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण को लागू करें | यदि किसी क्षेत्र /प्रखण्ड में ध्वनि प्रदूषण निर्धारित सीमा से ज्यादा है तो ये अधिकारी जिम्मेदार होंगे | नियम पाँच के अनुसार उपरोक्त वर्णित प्राधिकारियों की लिखित अनुमति के बिना लाउडस्पीकर या किसी लोक सम्बोधन प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सकता | रात्री 10 बजे से प्रातः 6 बजे के मध्य लाउडस्पीकर के प्रयोग पर रोक लगा दी गई है |

अतः यदि किसी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति धार्मिक संस्था आदि लाउड स्पीकर का प्रयोग कर रहें है तो संबन्धित जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस कमिशनर से सूचना के अधिकार के अंतर्गत पूछा जा सकता है कि अमुक व्यक्ति या संस्था  कोलाउडस्पीकर का प्रयोग करने की उन्होने कोई लिखित अनुमति दी है क्या ? यदि लिखित अनुमति नहीं है तो कानून के अंतर्गत उन्होने क्या कार्यवाही की ? उक्त लाउडस्पीकर ध्वनि यंत्र आदि द्वारा कितने डेसीबल द्वाणी उत्पन्न की जा रही है ? यह सब सूचना के अधिकार के अंतर्गत पूछा जा सकता है | इतना ही नही तो यदि कही ध्वनि हो रहा है तो उसके संबंध में निम्नांकित क़ानूनों का भंग होने के कारन पुलिस थाने में ‘एफ़आईआर ‘ दर्ज कराई जा सकती है –

  1. ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम ,2000 के नियम पाच व 6 सपठित पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 15 के अंतर्गत |
  2. अत्यधिक ध्वनि से जनता को परेशानी होने पर भारतीय दंड संहिता (IPC)268 के अंतर्गत |
  3. संबन्धित राज्य के पुलिस अधिनियम के अंतर्गत यदि लाउडस्पीकर का प्रयोग बिना अनुमति किया जा रहा है |

नवी मुबाई के इलाके में मदरसा तथा मस्जिद के माध्यम से 4-6 लाउडस्पीकर का प्रयोग किया जा रह था, जिसके विरुद्ध सूचना के अधिकार में सूचना मांगी गई थी कि क्या इतने लाउडस्पीकर प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की गई है , यदि हा तो किस कानून के अंतर्गत ओर क्यों (आवासीय कॉलोनी में ) और यदि अनुमति नहीं दी गई थी तो बिना अनुमति 4-6 लाउडस्पीकर प्रयोग करने पर क्या कार्यवाही की गई | यदि कार्यवाही नहीं की गई तो किस अधिकाररी की ज़िम्मेदारी थी –कार्यवाही करने को उसक नाम व पदनाम बताया जाय | एसी सूचना मांगने पर अधिकारियों में हड़कंप मच गया और परिणाम यह हुआ कि पुलिस ने संबन्धित व्यक्ति लतीफ़ खान को थाने बुलाया तथा बिना अनुमति उपयोग में लिए जाने वाले लाउडस्पीकर को हटवा दिया |

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                                                                                            तथ्य एवं आलेख

 
अध्याय – 14 

रंगनाथ मिश्र आयोग रिपोर्ट : मतांतरण को बढ़ावा

 

  भारत सरकार ने 29 अक्तूबर 2004 को सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश  रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया | ‘रंगनाथ मिश्र आयोग’ नाम से प्रसिद्ध इस आयोग के गठन का मुख्य उद्देश्य ‘मजहबी और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों में सामाजिक और आर्थिक आधार ’ पर पिछड़े वर्गों की पहिचान करने हेतु मापदंड तय करने तथा उनके कल्याण के लिए शिक्षण संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण सहित अन्य उपायों की सिफ़ारिस करना था |

‘हिन्दू समाज की अनुसूचित जाति से मतांतरित होकर मुसलमान या ईसाई संप्रदाय में जाने वाले लोगों को अनुसूचित जाति वालों को मिलने वाले सभी लाभ मिलते रहने चाहिए ’- एसी मांग इसाइयों द्वारा लंबे समय से की जाती रही है | इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय में भी ईसाई समाज की ओर से प्रस्तुत दो रिट  याचिकाएं (संख्या 180/04 तथा 95/05) लंबित है इन रिट याचिकाओं का बहाना बना कर सरकार ने रंगनाथ आयोग को इस मुद्दे पर भी विचार कर अपनी शिफारिश प्रस्तुत करने को कह दिया |

रंगनाथ मिश्र आयोग की शिफ़ारिसें

रंगनाथ मिश्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकार से मोटे तोर पर निम्नांकित शिफ़ारिसें की :-

  1. शिक्षण संसथाओं में 10 % स्थान मुसलमानों के लिए तथा 5 % अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षित होने चाहिए |
  2. सभी राज्यों में एक एक विश्वविध्यालय का चयन कर उसे मुस्लिम विध्यार्थियों में शिक्षा के प्रसार हेतु विशेष ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए |
  3. मदरसों सहित मुसलमानों द्वारा चलाये जाने वाले शिक्षण संस्थाओं को अधिक आर्थिक सहायता व अन्य सभी प्रकार की सुविधायेँ दी जाएँ |
  4. मुसलमानों को नए स्कूल कालेज प्रारम्भ करने के लिए उदारता से आर्थिक सहायता दी जाए |
  5. केंद्रीय व राज्य सरकारों के अधीन सभी नोकरियों में 10 प्रतिशत स्थान मूसलमानों के लिए तथा 5% अन्य अल्पसंख्यकों के लिए चिन्हित कर दिया जाय |
  6. 6.     ईसाई तथा मुस्लिम संप्रदाय में चाहे जातिप्रथा न हो तो भी हिदुओं की अनुसूचित जाति से मतांतरित होकर मुसलमान या ईसाई बनाने वालों को भी अनुसूचित जाति में ही माना जाय | इसके लिए बाधक संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की धारा तीन को हटा दिया जाना चाहिए|

 

आयोग की सिफ़ारिशों का परिणाम

  1. आयोग की उक्त सिफारिसों से मुस्लिम समाज और ईसाई समाज में अलगाव की भावना और अधिक बलवती होती है |
  2. मजहब के नाम पर मुसलमान व इसाइयों को शिक्षा व नौकरीयों में आरक्षण देने पर हिन्दू समाज में तीव्र प्रतिकृया होगी जिसका प्रभाव समाज की समरसता पर पड़ेगा |
  3. अनुसूचित जाति के व्यक्ति के द्वारा मतांतरण के पश्चात भी उसे पूर्व में अनुसूचित जाति के नाते लाभ मिलते रहने का नियम बन जाने पर देश में मतांतरण की प्रक्रिया में तेजी आ सकती है |
  4. लोकसभा तथा अन्य राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर ईसाई व मुस्लिम समाज के लोग चुनाव लड़ सकेंगे | इस प्रकार से भारत पाकिस्तान बांटवारे के पश्चात शेष भारत की सत्ता पर भी कब्जा करने के मुस्लिम मंसूबों को बल मिलेगा |

स्पष्ट है की रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशें मान लिए जाने पर दूरगामी विघटनकारी और भयंकर परिणाम हो सकते है |

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अध्याय – 15 

सच्चर समिति की रिपोर्ट : अलगाव की दिशा में आत्मघाती कदम

 भारत सरकार ने सन 2005 में पूर्व न्यायाधीश श्री राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया | इस समिति को मुसलमानों के सामाजिक एवं शैक्षणिक प्रश्नों पर अध्ययन कर अपनी अनुशंसा प्रकट करने के लिए कहा गया |

इतिहास की पुनरावृत्ति   

अंग्रेजों ने सन 1871 में इसी तरह के उद्द्येश्य के साथ ‘हंटर आयोग’ गठित किया था जो अंततः पाकिस्तान निर्माण का कारण बना | अंग्रेजों ने ‘बाँटों और राज करो’ की नीति के अंतर्गत मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध खड़ा करने के लिए इस देश में बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक शब्दावली का निर्माण किया तथा मुसलमानों को हिंदुओं के एक प्रतिद्वंदी समुदाय के रूप में मजबूत करने का निर्णय लिया | इस कार्य हेतु यह दिखाना आवश्यक था कि मुसलमानों की भारत में स्थिति हिंदुओं की तुलना में ठीक नहीं है | साथ ही उनकी पहिचान को हिंदुओं से खतरा है | इस कार्य के लिए सन 1871 में हंटर आयोग का गठन किया गया | हंटर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में शिक्षा रोजगार आदि मामलों में मुसलमानों की स्थिति थीक नहीं होना दर्शाते हुए इसके लिए राज्य शासन तथा हिंदुओं, दोनों को दोषी ठहराया | जबकि उस समय प्रशासनिक एवं न्यायिक सेवा में मुसलमान अपनी जनसंख्या की तुलना में अधिक संख्या में थे | इस हंटर समिति की रिपोर्ट ने भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा दी | मुस्लिम नेत्रत्व ने ‘हिन्दू आधिपत्य‘ का हव्वा खड़ा कर औपनिवेशिक अँग्रेजी सरकार से मित्रता एवं सहयोग का दृष्टिकोण अपनाना प्रारम्भ कर दिया | हंटर रिपोर्ट ने पाकिस्तान निर्माण की मांग को तार्किक आधार प्रदान किया | हंटर समिति तथा सच्चर समिति की रिपोर्ट के बीच आश्चर्यजनक रूप से समानता दिखाई देती है |

 सच्चर समिति के खतरनाक निष्कर्ष एवं टिप्पणियाँ

  • भारत में मुसलमान आर्थिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े है तथा सरकारी व अन्य नौकरियों में उनकी संख्या बहुत कम है |
  • इस देश में मुसलमानो की पहिचान खतरे में है |
  • दाढ़ी व टोपी वाले मुस्लिम युवकों को सार्वजनिक स्थानो तथा पार्कों , रेलवे स्टेशनों, एवं बाज़ारों से प्रायः उठाकर पूछताछ के लिए ले जया जाता है |
  • व्यावसायिक कार्यालयों में बुर्का पहनने वाली महिलाओं के लिए काम करना कठिनतर होता जा रहा है |
  • भारत में मुस्लिम औरतों की इज्जत आबरू सार्वजनिक स्थानों पर पूरी तरह से असुरक्षित है तथा मुस्लिम महिलाओं के लिए एकमात्र सुरक्षित स्थान चारदीवारी एवं समुदाय है |
  • मुस्लिम महिलाओं के लिए समुदाय की चारदीवारी के बाहर सभी स्थान बाजार ,सड़क, गली, सार्वजनिक परिवहन, स्कूल, अस्पताल, पुलिस स्टेशन सरकारी कार्यालय असुरक्षित, शत्रुतापूर्ण महसूस होते है |
  • स्कूल कालेजों में मूसलमानों के साथ व्यवहार में सभ्यता का अभाव, क्रूरतापूर्ण प्रश्नोत्तर तथा द्वितीय श्रेणी के नागरिकों की तरह व्यवहार होता है |
  • भारत में मुसलमान के लिए शत्रुता पूर्ण वातावरण है इसलिए वे अपनी बेटियों को स्कूल कालिज में पढ़ने के लिए नहीं भेजते |

उपरोक्त निष्कर्षों के लिए सच्चर समिति ने कोई आधार नहीं बताया है | इन निष्कर्षों के कारण न केवल सरकार बल्कि हिंदुओं के चरित्र पर सीधा हमला कर दिया है | मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिय जिम्मेदार असली कारण जैसे उनका मदरसों में पढ़ना, पढ़ाई के बजाय कोई हुनर सीखने के इच्छा, बुर्का प्रथा तथा महिलाओं को ढक कर रखने जैसी परम्पराओं पर समिति ने जरा भी विचार नहीं किया | इसके कारण मुसलमान अपने पिछड़ेपन के असली करणों को दूर करने में असमर्थ रहेंगे |

देश की बहुसंख्यक जनता के चरित्र पर आक्षेप के कारण उनके मन में मुसलमानों के प्रति दुर्भावनाएँ पनप सकती है |

सच्चर समिति के रिपोर्ट के आधार पर मुस्लिम छत्रों को छात्रवृत्ति देने, उन्हे बैकों से ­­­­­­­­­­­­­­­कर्ज देने में प्राथमिकता जैसे- सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से देश में धार्मिक भेदभाव प्रारम्भ हो गया है | बहुसंख्यक हिन्दू अपने ही देश में धार्मिक आधार पर भेदभाव का शिकार होने से कुंठित होंगे |

कुल मिलकार सच्चर समिति की रिपोर्ट से मुसलमानों में अलगाव की भावना पनपेगी तथा देश में धार्मिक आधार पर भेदभाव प्रारम्भ होगा | जो भारत के संविधान का भी उल्लंघन होगा | इसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे |

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अध्याय – 16 

धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम : समस्त राज्यों के लिए अपेक्षित

 संविधान निर्मात्री सभा में विचारार्थ प्रस्तुत संविधान के मूल प्रारूप में कपट दवाब या प्रलोभन से मतांतरण करने पर पाबंदी का प्रावधान था |परंतु जब इस प्रावधान पर अंतिम बहस चल रही थी तो कुछ ईसाई सदस्यों के विरोध को देखते हुए उक्त प्रावधान को यद्यपि संविधान में नहीं जोड़ा गया, परंतु इस विषय को राज्यों के विचारार्थ छोड़ दिया गया | राज्य अपने यहाँ की लोक व्यवस्था की स्थिति के अनुसार कानून बना सकेंगे, यह माना गया |(देखें इस पुस्तिका का अध्याय- दो )

अनुभव यह आया कि स्वतंत्र भारत में ईसाई मिशनरीज़ ज़ोर शोर से हिन्दू समाज के पिछड़े वर्ग विशेषकर वनवासियों (जंजातियों) को मतांतरित करने में जुट गई | इसके कारण जन जातीय क्षेत्रों में लोक व्यवस्था की स्थिति विगड़ने लगी | उसके गाँव समाज की शांति भंग होने लगी | लोगों में आपसी सदभाव एवं सामजस्य समाप्त होने लगा | अतः उड़ीसा मध्य प्रदेश में वहाँ की सरकारों ने दबाव, भय प्रलोभन से किए जाने वाले मतांतरण पर रोक लगाने का कानून बनाया है | इस कानून को धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम या इससे मिलता जुलता नाम दिया गया | ईसाई मिशनरीज़ द्वारा एसे कानून को चुनौती दिये जाने पर सर्वोच्च न्यायालय ने इन क़ानूनों को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया | (देखें इस पुस्तिका का अध्याय -तीन )  उड़ीसा एवं मध्य प्रदेश राज्यों का अनुसरण करते हुए हिमांचल प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में भी धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पारित किए गए |

धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के प्रावधान  

विभिन्न राज्यों द्वारा पारित किए गए इन अधिनियमों में दबाव, अनुचित प्रभाव, लोभ-लालच, प्रलोभन आदि द्वारा कराये गये मतांतरण को अपराध घोषित किया गया है | इस हेतु प्रावधान बनाया गया है कि कोई भी व्यक्ति अपना मजहब त्याग कर दूसरे मजहब को स्वीकारना चाहता है अर्थात मतांतरण करना चाहता है तो उसे जिला कलक्टर को निर्धारित अवधि से पूर्व सूचना देनी होगी | कलक्टर इस बात की छानबीन करेगा कि उस व्यक्ति पर मतांतरण के लिए कोई दबाव या अनुचित प्रभाव तो नहीं डाला गया | या उसे मतांतरण के लिए कोई लोभ–लालच तो नहीं दिया गया है | अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन होने पर दंड की व्यवस्था भी इन अधिनियमों में की गई है | यदि कई व्यक्ति अपने मूल धर्म या मजहब में लौटना चाहता है तो इसे मतांतरण नहीं माना गया है | यह परावर्तन का मामला है जो मान्य होगा |

राजस्थान की विधान सभा ने भी ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ पारित कर राज्यपाल को हस्ताक्षर हेतू भेजा था | परंतु तत्कालीन राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने उस पर हस्ताक्षर न करते हुए उसे महामहिम राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भिजवा दिया | संविधान सभा द्वारा अवैध मतांतरण पर रोक लगाने का विषय राज्यों पर छोड़ने तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसे कानून को असंवैधानिक ठहराने के पश्चात राजस्थान के राज्यपाल द्वारा उक्त विधेयक को रोके रखना समझ के बाहर की बात है | देर सबेर राजस्थान का उक्त विधेयक कानून का रूप अवश्य लेगा |

जिन राज्यों में ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम’ जैसे कानून नही बने हैं , वहाँ जनता तथा सामाजिक संगठनों व कार्यकर्ताओं को संबन्धित सरकार के सामने एसे कानून बनाने के लिए दाबाव बनाना चाहिए |

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                                                                                           परिशिष्ट

 हिमांचल प्रदेश धर्म की स्वतन्त्रता विधेयक , 2006

  (विधान सभा द्वारा यथा संशोधित पारित)

 

किसी एक धर्म से दूसरे धर्म में बल प्रयोग या उत्प्रेरणा द्वारा या कपटपूर्ण साधनों द्वारा संपरिवर्तन प्रतिषिद्ध करने के लिए तथा उससे संबन्धित या उसके अनुसंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए विधेयक |

भारत गणराज्य के सत्तावनवें वर्ष में हिमांचल प्रदेश विधान सभा द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित है :-

  1. इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम हिमांचल प्रदेश धर्म की स्वतन्त्रता अधिनियम ,2006 है |
  2. इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो -

(क)    ‘संपरिवर्तन ’ एक धर्म का त्याग करना तथा तथा दूसरे को अपनाना अभिप्रेत है |

(ख)    ‘बल’ के अंतर्गत बल का प्रदर्शन या क्षति की धमकी या दैवी अप्रसाद या सामाजिक बहिसकार की धमकी आएगी |

(ग)     ‘कपट’ के अंतर्गत दुर्व्यपदेशन या अन्य कपट पूर्ण प्रयुक्ति आएगी |

(घ)     ‘उत्प्रेरणा’ के अंतर्गत किसी भी प्रकार के दान या परितोषण की , या तो वस्तुरूप में या नकद में प्रस्थापना करना या किसी भी प्रकार की प्रसुविधा, चाहे धन संबंधी हो या अन्यथा , देना आएगा |

(ङ)      ‘अवयस्क’ से अठारह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति अभिप्रेत है |

3.  कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्षतः या अन्यथा किसी भी व्यक्ति को ,बल प्रयोग द्वारा या किसी अन्य कपटपूर्ण साधन द्वारा किसी एक धर्म से दूसरे धर्म में न तो संपरिवर्तन करेगा नहीं इसका प्रयत्न करेगा , ना ही कोई भी व्यक्ति एसे किसी संपरिवर्तन को दुष्प्रेरित करेगा |

परंतु कोई भी व्यक्ति जिसका इस धारा के सम्बन्धों के उल्लंघन में किसी एक धर्म से दूसरे धर्म में संपरिवर्तन हुआ है तो वह संपरिवर्तित हुआ नही समझा जाएगा |

4.  (A) कोई भी व्यक्ति जो किसी एक धर्म से दूसरे धर्म में संपरिवर्तन का आशय रखता है तो वह अपने एसा करने के 30 दिन पूर्व सूचना संबन्धित जिला के जिला मजिस्ट्रेट को देगा और जिला मजिस्ट्रेट मामले की जांच , एसे अभिकरण जैसा वह उचित समझे , से करवाएगा | परंतु यदि कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म में वापिस आना चाहता है तो कोई सूचना अपेक्षित नहीं होगी |

(B) कोई भी व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन या अपेक्षित पूर्वक सूचना देने में असफल होगा, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपये का हो सकता है, दंडनीय होगा |

5.   कोई भी व्यक्ति जो धारा तीन के उपवन्धो का उल्लंघन करता है तो वह, किसी भी सिविल दायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जो दो वर्ष का हो सकेगा या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपये का होगा, या दोनों से दंडनीय होगा |परंतु अपराध किसी अवयस्क, किसी महिला या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबन्धित किसी व्यक्ति की बाबत किया गया है तो कारावास का दंड तीन वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना पचास हजार रुपये तक हो सकेगा |

  1. इस अधिनियम के अधीन अपराध संज्ञेय होगा तथा इसका अन्वेषन पुलिस निरीक्षक से नीचे की पंक्ति के किसी अधिकारी द्वारा नहीं किया जाएगा |
  2. इस अधिनियम के अधीन किसी धी अपराध का अभियोजन जिला, मजिस्ट्रेट या एसे या एसे अन्य प्राधिकारी, उपमंडल अधिकारी की पंक्ति से नीचे का न हो, जिसे उस निमित्त द्वारा प्रदीकृत किया जाय, कि मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा |
  3. (1) राज्य सरकार इस अधिनियम के उपबद्धों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी |

(2)इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात यथाशक्यशीघ्र विधान सभा के समक्ष जब वह सत्र में हो कुल दस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा जो एक सत्र में या दो अनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी और उस सत्र के जिसमें वह इस प्रकार रखा गया हो या उपरोक्त अनुक्रमिक सत्रों में अवसान से पूर्व विधान सभा नियम में कोई परिवर्तन करती है या सहमत हो जाती है कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात , यथा स्थिति , एसा नियम एसे परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नही पड़ेगा |तथापि एसे किसी परिवर्तन या बतिलीकरण से उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा |

मैं ,”हिमांचल प्रदेश धर्म की स्वतन्त्रता विधेयक , 2006 (2006 का विधेयक संख्यांक 31)” के उपर्युक्त अनुवाद को भारत के अनुच्छेद 348 (3) के अधीन राजपत्र , हिमांचल प्रदेश में प्रकाशित किए जाने के लिए प्राधिकृत करता हूँ |

                                                                                                                                                                            राज्यपाल   

                                                                                                                                                                       हिमांचल प्रदेश

राज्यपाल ने “हिमांचल प्रदेश धर्म की स्वतन्त्रता विधेयक ,2006 (2006 का विधेयक संख्यांक 31)” के उपर्युक्त अनुबाद को भारत के संबिधान के अनुच्छेद 348 (3) के अधीन राज पत्र हिमांचल प्रदेश में प्रकाशित किए जाने के लिए प्राधिकृत कर दिया है |

                                                                                                                                                                                    सचिव (विधि)

हिमांचल प्रदेश सरकार

मतांतरण : क्या कहते है महापुरुष

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महात्मा गांधी (हरिजन समाचार पत्र दिनांक 7.12.1931)

“यदि ईसाई चर्च शिक्षा- चिकित्सा- स्वस्थ्य और मानवीय सेवा के अपने कार्यों का उपयोग तदतिरिक्त हिंदुओं का धर्मांतरण करने में करता है तो मैं इसाइयों को निश्चय ही इस देश को छोडकर चले जाने को कहूँगा |”

महात्मा गंधी (अरूण शौरी की पुस्तक मिशनरीज़ इन इंडिया ”,पृष्ठ 44)

“मेरी दृष्टि में यह (घर वापिसी) मतांतरण का उदाहरण नहीं है | यदि कोई व्यक्ति भय, मजबूरी, भूख के कारण या किसी भौतिक लाभ के लिए किसी अन्य धर्म को अपनाता है तो मतांतरित की घर वापिसी को मतांतरण कहना अनुचित है | मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि हिन्दू समाज को एसे सभी पश्चाताप में दग्ध लोगों को वेझिझक होकर स्वयं ही आत्मसात करना चाहिए|”

 

 

श्री गुरुजी (प॰ पू॰ माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर)

(स्पॉट लाइट्स पुस्तक के प्रष्ठ 147 से उद्धृत )

“हमें वनवासियों किंवा जनजातियों और गिरिजनों की विशेष सुध लेनी चाहिए, यदि अब भी इस दिशा में उदासीन रहे तो ये विदेशी ईसाई मिशनरी उनका ईसाई धर्म में मतांतरण करने में सफल हो जाएंगे और उन्हें हमारी मातृभूमि का शत्रु बना देंगे|”

डॉ॰ अंबेडकर (ब्लीट्ज़ ,15 मई ,1993 से उद्धृत )

“धर्म परिवर्तन का समस्त राष्ट्र के लिए क्या परिणाम हो सकता है, यह मनन करने योग्य बात है | इस्लाम या ईसाई मत में परिवर्तन हो जाना दलित वर्गों को अराष्ट्रीय (राष्ट्रीय भावनाहीन ) बना देगा |”

डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति)

(इंडिया डिवाइडेड में )

“यदि हिन्दू अपनी ओर से हिंदुओं को अपने धर्म में मतांतरित करना प्रारंभ करते है तो इस पर इन गैर हिंदुओं को आपत्ति करने का कोई कारण नहीं है |जो स्वयं मतांतरण के कम में प्रवृत्त हैं |”

प्रसिद्ध ग्रंथकार वी॰ एस॰ नायपाल अपनी पुस्तक Beyond Belief (श्रद्धापार में)

प्रत्येक गैर अरबी मुसलमान मतांतरित मुसलमान है| मतांतरित आदमी की वैयक्तिक दृष्टि बादल जाती है | उसकी इतिहास संबंधी सोच बादल जाती है , जो कुछ उसका अपना था उसे वह तिरस्कृत करता है | न चाहने पर भी वह अरबी इतिहास का अंग बन जाता है मतांतरित को अपने सर्वस्व से बादल जाना पड़ता है और यह बदलना बार-बार करना पड़ता है |”   

“Every one not an Arab who is a muslim is a convert . A convert’s world view alters . His idea of history alters . He rejects his own ; he becomes , whether he likes it or not part of arab history . the convert has to turn away from everything that is his , turning away has to be done again and again.

 

 

लोकमान्य तिलक (प्रमुख समाचार पत्र केसरी सन 1895)

“आँखों के सामने आपके बालबच्चों का मतांतरण देखकर आप शांत कैसे बैठते है ? फुसलकर भ्रष्ट किए गए उनको स्वधर्म में वापिस लाने के उपाय आपको सूझते नही क्या ? इस प्रकार आपके धर्म का एकतरफा क्षय होता रहा और आप चुप बैठते हैं , तो धन्य है आपकी विद्वता| ”

 

 
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